Ekadashi 2026 Complete Calendar: एकादशी हिन्दू पंचांग की ग्यारहवीं तिथि होती है, जो प्रत्येक माह शुक्ल और कृष्ण पक्ष में आती है। इस प्रकार वर्ष 2026 में कुल 24 एकादशी होंगी। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और इसे संयम, आत्मशुद्धि और पुण्य प्राप्ति का साधन कहा गया है। इस व्रत में सामान्यतः अनाज का त्याग कर फल या सात्विक भोजन किया जाता है। व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है, जब इसे पंचांग अनुसार सही तिथि पर रखा जाए और द्वादशी में उचित समय पर पारण किया जाए।

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Ekadashi 2026 Complete Calendar: एकादशी का अर्थ और महत्व
हिन्दू धर्म में एकादशी का विशेष स्थान है। पंचांग के अनुसार हर माह दो पक्ष होते हैं — शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। इन दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहा जाता है। इस प्रकार एक वर्ष में लगभग 24 एकादशी आती हैं। एकादशी का व्रत मुख्य रूप से भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है, इसलिए इसे विष्णु-भक्ति का श्रेष्ठ साधन कहा गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं है, बल्कि यह संयम, शुद्ध आचरण और आत्मनियंत्रण का पर्व है। इस दिन मनुष्य अपने भोजन, विचार और व्यवहार — तीनों पर नियंत्रण रखता है। यही कारण है कि शास्त्रों में एकादशी को “पाप नाश करने वाली तिथि” कहा गया है।
पुराणों में उल्लेख मिलता है कि एकादशी व्रत करने से मनुष्य के पुराने पाप नष्ट होते हैं और पुण्य की वृद्धि होती है। विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में एकादशी को अत्यंत पवित्र माना गया है। कई भक्त इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करते, कुछ केवल फलाहार करते हैं और कुछ निर्जला व्रत भी रखते हैं।
एकादशी का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यवहारिक भी है। महीने में दो बार हल्का या सीमित भोजन करना शरीर को विश्राम देता है। आयुर्वेद में भी समय-समय पर उपवास को लाभकारी माना गया है। इस प्रकार एकादशी व्रत धर्म और स्वास्थ्य — दोनों का संतुलन प्रस्तुत करता है।
वर्ष 2026 में आने वाली सभी एकादशियाँ अपने-अपने नाम, महत्व और फल के कारण विशेष होंगी। कुछ एकादशी मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती हैं, कुछ संतान-सुख, कुछ रोग नाश और कुछ पारिवारिक शांति के लिए प्रसिद्ध हैं। इस लेख में हम 2026 की सम्पूर्ण एकादशी सूची, उनकी सही तिथियाँ, पारण समय और व्रत विधि को विस्तार से समझेंगे।
🔔 महत्वपूर्ण सूचना
यह लेख वर्ष 2026 की सभी एकादशी तिथियों, पारण समय और व्रत नियमों को प्रामाणिक हिन्दू पंचांग के आधार पर तैयार किया गया है। हर तिथि को कई पंचांग स्रोतों से मिलाकर सत्यापित किया गया है।
एकादशी व्रत क्यों रखा जाता है?
एकादशी व्रत रखने के पीछे गहरे धार्मिक कारण बताए गए हैं। शास्त्रों के अनुसार, एकादशी के दिन मनुष्य का चित्त अधिक शांत और स्थिर रहता है। यही कारण है कि इस दिन पूजा, जप और ध्यान अधिक फलदायी माने जाते हैं।
पुराणों में वर्णन है कि एक बार पाप नामक दैत्य ने सभी लोकों में उत्पात मचा दिया था। तब भगवान विष्णु ने अपने तेज से एक दिव्य शक्ति उत्पन्न की, जिसे एकादशी कहा गया। उसी दिन से यह तिथि पाप नाश करने वाली मानी जाने लगी। इस कथा के कारण एकादशी व्रत को पापों से मुक्ति का साधन माना जाता है।
गृहस्थ जीवन में व्यक्ति अनेक जिम्मेदारियों में उलझा रहता है। एकादशी का व्रत उसे महीने में दो बार आत्मचिंतन का अवसर देता है। इस दिन व्यक्ति अनावश्यक भोग से दूर रहकर ईश्वर स्मरण करता है। यह अभ्यास मन को शुद्ध करता है और अहंकार को कम करता है।
व्यवहारिक दृष्टि से देखें तो एकादशी व्रत संयम और अनुशासन सिखाता है। जब व्यक्ति स्वेच्छा से भोजन, स्वाद और आराम का त्याग करता है, तो उसका आत्मबल बढ़ता है। यही आत्मबल जीवन की कठिन परिस्थितियों में सहायक बनता है।
कई लोग यह भी मानते हैं कि एकादशी व्रत से पारिवारिक वातावरण शुद्ध होता है। घर में शांति बनी रहती है और नकारात्मकता कम होती है। इसलिए भारत के अनेक घरों में एकादशी को विशेष दिन माना जाता है और इस दिन सात्विक आहार, भजन और कथा का आयोजन किया जाता है।
इस प्रकार एकादशी व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक, मानसिक और सामाजिक सुधार का मार्ग है। यही कारण है कि सदियों से यह व्रत श्रद्धा और नियम के साथ किया जाता रहा है।
वर्ष 2026 में कुल कितनी एकादशी होंगी?
सामान्य रूप से एक हिन्दू वर्ष में 24 एकादशी आती हैं — प्रत्येक माह में दो। एक शुक्ल पक्ष की और एक कृष्ण पक्ष की। कभी-कभी अधिक मास की स्थिति में दो अतिरिक्त एकादशी भी हो सकती हैं, जिससे कुल संख्या 26 तक पहुँच जाती है।
वर्ष 2026 के पंचांग के अनुसार, यह एक सामान्य स्थिति वाला वर्ष है, जिसमें प्रमुख रूप से 24 एकादशी मानी गई हैं। इनमें कुछ एकादशी अत्यंत प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण हैं, जैसे — निर्जला एकादशी, देवशयनी एकादशी, देवउठनी एकादशी और मोक्षदा (वैकुंठ) एकादशी।
हर एकादशी का नाम, उसका अलग महत्व और अलग फल बताया गया है। उदाहरण के लिए:
- निर्जला एकादशी को सबसे कठिन और सबसे फलदायी माना जाता है।
- देवशयनी एकादशी से चातुर्मास आरंभ होता है।
- देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं।
- मोक्षदा एकादशी को मोक्ष देने वाली तिथि कहा गया है।
2026 में आने वाली सभी एकादशियों की तिथियाँ पंचांग के अनुसार भली-भांति जाँची गई हैं, ताकि पाठकों को कोई भ्रम न हो। इस लेख के अगले भागों में हम माह-वार सम्पूर्ण एकादशी सूची, उनके सही दिन, तिथि, और पारण समय विस्तार से प्रस्तुत करेंगे।
यदि कोई व्यक्ति पूरे वर्ष सभी एकादशी का व्रत नहीं रख सकता, तो भी वह इन प्रमुख एकादशियों का व्रत रखकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।
Ekadashi 2026 Complete Calendar: (जनवरी से दिसंबर)
जनवरी 2026 की एकादशी
जनवरी 2026 में दो एकादशी आती हैं, जो माघ मास से संबंधित हैं। यह समय धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है क्योंकि माघ मास में दान, जप और व्रत का विशेष महत्व बताया गया है।
(1) षटतिला एकादशी — 14 जनवरी 2026 (कृष्ण पक्ष)
इस एकादशी को तिल से जुड़ी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन तिल का दान करने से पापों का नाश होता है और पितरों को शांति मिलती है। व्रती इस दिन तिल, गुड़ और काले तिल का प्रयोग करते हैं। कई स्थानों पर तिल के लड्डू बनाकर दान देने की परंपरा है। इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।
(2) जया एकादशी — 29 जनवरी 2026 (शुक्ल पक्ष)
जया एकादशी को मोक्ष प्रदान करने वाली तिथि माना गया है। पुराणों के अनुसार इस व्रत से व्यक्ति को जीवन में आने वाले कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस दिन व्रती भगवान विष्णु का ध्यान, कथा-श्रवण और भजन करते हैं। माना जाता है कि जया एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को अगले जन्म में उत्तम गति प्राप्त होती है।
जनवरी की दोनों एकादशी आत्मशुद्धि और संयम का संदेश देती हैं। वर्ष के आरंभ में इन व्रतों को करने से पूरा वर्ष शुभ रहने की कामना की जाती है।
फरवरी 2026 की एकादशी
फरवरी 2026 में आने वाली एकादशियाँ फाल्गुन मास से जुड़ी हैं। यह मास धीरे-धीरे ऋतु परिवर्तन का संकेत देता है और व्रत के माध्यम से शरीर व मन को संतुलित रखने का अवसर प्रदान करता है।
(1) विजया एकादशी — 13 फरवरी 2026 (कृष्ण पक्ष)
विजया एकादशी का अर्थ है — विजय देने वाली। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से जीवन में आने वाली बाधाओं पर विजय मिलती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए शुभ माना गया है जो किसी कठिन कार्य की शुरुआत करने जा रहे हों। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा कर उनसे सफलता की प्रार्थना की जाती है।
(2) आमलकी एकादशी — 27 फरवरी 2026 (शुक्ल पक्ष)
आमलकी एकादशी का संबंध आंवले के वृक्ष से बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन आंवले की पूजा करने और उसका सेवन करने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है। यह एकादशी दीर्घायु और रोग-नाश के लिए प्रसिद्ध है। कई भक्त इस दिन आंवले का दान भी करते हैं।
फरवरी की एकादशियाँ संयम, स्वास्थ्य और विजय का प्रतीक हैं। इन व्रतों से व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है।
मार्च 2026 की एकादशी
मार्च 2026 में चैत्र मास की एकादशियाँ आती हैं। चैत्र मास को नववर्ष का प्रारंभ भी माना जाता है, इसलिए इस माह के व्रतों का विशेष महत्व है।
(1) पापमोचनी एकादशी — 15 मार्च 2026 (कृष्ण पक्ष)
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, यह एकादशी पापों से मुक्ति देने वाली मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि अनजाने में किए गए दोष भी इस व्रत से नष्ट हो जाते हैं। इस दिन कथा-श्रवण और दान का विशेष महत्व है।
(2) कामदा एकादशी — 29 मार्च 2026 (शुक्ल पक्ष)
कामदा एकादशी को मनोकामना पूर्ण करने वाली तिथि कहा गया है। जो भक्त श्रद्धा से इस व्रत को करते हैं, उनकी इच्छाएँ पूरी होती हैं। यह एकादशी पारिवारिक सुख और संतुलन के लिए प्रसिद्ध है।
मार्च की एकादशियाँ जीवन में नए आरंभ और आत्मशुद्धि का संदेश देती हैं।
अप्रैल 2026 की एकादशी
अप्रैल 2026 में वैशाख मास की एकादशियाँ आती हैं। वैशाख मास को पुण्यकारी माना गया है।
(1) वरुथिनी एकादशी — 13 अप्रैल 2026 (कृष्ण पक्ष)
इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को विशेष पुण्य प्राप्त होता है। मान्यता है कि यह व्रत दरिद्रता को दूर करता है और जीवन में स्थिरता लाता है।
(2) मोहिनी एकादशी — 27 अप्रैल 2026 (शुक्ल पक्ष)
मोहिनी एकादशी का संबंध भगवान के मोहिनी रूप से बताया जाता है। यह व्रत करने से मोह, भ्रम और नकारात्मक विचार दूर होते हैं। विद्यार्थी और गृहस्थ दोनों के लिए यह व्रत लाभकारी माना गया है।
मई 2026 की एकादशी
मई 2026 में ज्येष्ठ मास की एकादशियाँ आती हैं।
(1) अपरा एकादशी — 13 मई 2026 (कृष्ण पक्ष)
अपरा एकादशी को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस व्रत से यश, सम्मान और सद्गुणों की वृद्धि होती है।
(2) पद्मिनी एकादशी — 27 मई 2026 (शुक्ल पक्ष)
यह एकादशी विशेष रूप से पुण्य वृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए जानी जाती है। दान और जप का इस दिन विशेष महत्व है।
जून 2026 की एकादशी
जून 2026 में ज्येष्ठ मास की दो महत्वपूर्ण एकादशियाँ आती हैं, जिनमें से एक को वर्ष की सबसे कठिन एकादशी माना जाता है।
(1) परम एकादशी — 11 जून 2026 (कृष्ण पक्ष)
परम एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को उत्तम फल प्राप्त होता है। यह व्रत जीवन में शुद्धता और स्थिरता लाता है।
(2) निर्जला एकादशी — 25 जून 2026 (शुक्ल पक्ष)
निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता। धार्मिक मान्यता है कि इस एक व्रत से वर्ष की सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाता है। यह व्रत अत्यंत कठिन होने के कारण केवल स्वस्थ व्यक्ति ही रखते हैं।
जुलाई 2026 की एकादशी
जुलाई 2026 में आषाढ़ मास की एकादशियाँ आती हैं। यह समय वर्षा ऋतु का आरंभ होता है और धार्मिक दृष्टि से चातुर्मास की तैयारी का संकेत देता है।
(1) योगिनी एकादशी — 10–11 जुलाई 2026 (कृष्ण पक्ष)
योगिनी एकादशी को रोग नाश और मानसिक शांति देने वाली माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत से पुराने रोगों में राहत मिलती है और मन की अशांति दूर होती है। इस दिन संयम, कथा-श्रवण और दान का विशेष महत्व बताया गया है। कई लोग इस व्रत को अपने स्वास्थ्य सुधार के संकल्प के साथ करते हैं।
(2) देवशयनी एकादशी — 25 जुलाई 2026 (शुक्ल पक्ष)
देवशयनी एकादशी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और चातुर्मास आरंभ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में विवाह और अन्य शुभ कार्य नहीं किए जाते। भक्त इस दिन विशेष पूजा, दीपदान और व्रत करते हैं। यह एकादशी संयम और साधना का मार्ग दिखाती है।
अगस्त 2026 की एकादशी
अगस्त 2026 में श्रावण मास की एकादशियाँ आती हैं। श्रावण मास स्वयं में भक्ति और व्रत का माह माना जाता है।
(1) कामिका एकादशी — 9 अगस्त 2026 (कृष्ण पक्ष)
कामिका एकादशी का व्रत करने से भय, दोष और नकारात्मकता से मुक्ति मिलने की मान्यता है। यह एकादशी पाप नाश और मन की स्थिरता के लिए जानी जाती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और दान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
(2) श्रावण पुत्रदा एकादशी — 23–24 अगस्त 2026 (शुक्ल पक्ष)
यह एकादशी संतान सुख के लिए प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान प्राप्ति और संतान की रक्षा होती है। दंपत्ति इस दिन श्रद्धा से व्रत रखते हैं और भगवान से परिवार की मंगल कामना करते हैं।
सितंबर 2026 की एकादशी
सितंबर 2026 में भाद्रपद मास की एकादशियाँ आती हैं। यह समय धीरे-धीरे वर्षा ऋतु के अंत की ओर बढ़ता है।
(1) आजा एकादशी — 7 सितंबर 2026 (कृष्ण पक्ष)
आजा एकादशी को राजयोग प्रदान करने वाली तिथि माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत से जीवन में प्रतिष्ठा और स्थिरता आती है। यह एकादशी विशेष रूप से गृहस्थ जीवन में संतुलन के लिए जानी जाती है।
(2) पार्श्व एकादशी — 22 सितंबर 2026 (शुक्ल पक्ष)
पार्श्व एकादशी को पाप नाश और पुण्य वृद्धि की तिथि कहा गया है। इस दिन दान, सेवा और भक्ति का विशेष महत्व है। यह व्रत जीवन में सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
अक्टूबर 2026 की एकादशी
अक्टूबर 2026 में आश्विन मास की एकादशियाँ आती हैं, जो शरद ऋतु से जुड़ी हैं।
(1) इन्दिरा एकादशी — 6 अक्टूबर 2026 (कृष्ण पक्ष)
इन्दिरा एकादशी का संबंध पितरों की शांति से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से पूर्वजों को तृप्ति मिलती है। इस दिन दान और स्मरण का विशेष महत्व है।
(2) पापांकुशा एकादशी — 22 अक्टूबर 2026 (शुक्ल पक्ष)
यह एकादशी पापों से मुक्ति देने वाली मानी जाती है। इस व्रत से जीवन में नई दिशा और सकारात्मकता आती है। श्रद्धा से किया गया यह व्रत व्यक्ति को आत्मबल प्रदान करता है।
नवंबर 2026 की एकादशी
नवंबर 2026 में कार्तिक मास की एकादशियाँ आती हैं, जिन्हें वर्ष की सबसे पवित्र एकादशियों में गिना जाता है।
(1) रमा एकादशी — 5 नवंबर 2026 (कृष्ण पक्ष)
रमा एकादशी का व्रत धन, समृद्धि और सुख के लिए किया जाता है। इस दिन दीपदान और पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।
(2) देवउठनी एकादशी — 20–21 नवंबर 2026 (शुक्ल पक्ष)
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसी दिन से शुभ कार्य पुनः आरंभ होते हैं। यह एकादशी अत्यंत महत्वपूर्ण और उत्सवपूर्ण मानी जाती है।
दिसंबर 2026 की एकादशी
दिसंबर 2026 में मार्गशीर्ष मास की एकादशियाँ आती हैं और वर्ष का धार्मिक समापन करती हैं।
(1) उत्पन्ना एकादशी — 4 दिसंबर 2026 (कृष्ण पक्ष)
उत्पन्ना एकादशी को एकादशी माता का प्रकट दिवस माना जाता है। इस व्रत से समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होने की मान्यता है।
(2) मोक्षदा / वैकुंठ एकादशी — 20 दिसंबर 2026 (शुक्ल पक्ष)
वैकुंठ एकादशी को मोक्ष देने वाली तिथि कहा गया है। मान्यता है कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुलते हैं। यह वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक है।
एकादशी तिथि कैसे निर्धारित होती है? (पंचांग समझें)
हिन्दू पंचांग में तिथि चन्द्रमा की गति के आधार पर निर्धारित होती है। सरल शब्दों में, चन्द्रमा और सूर्य के बीच कोणीय दूरी के बढ़ने या घटने से तिथियाँ बनती हैं। जब यह दूरी 11वें भाग पर पहुँचती है, तब एकादशी तिथि मानी जाती है। इसलिए तिथि की शुरुआत और समाप्ति घड़ी के समय से होती है, न कि केवल तारीख बदलने से।
यही कारण है कि कभी-कभी एकादशी तिथि एक दिन की शाम से शुरू होकर अगले दिन तक चलती है। पंचांग में इसे “तिथि आरम्भ” और “तिथि समाप्ति” कहा जाता है। आम लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि व्रत किस दिन रखना है — इसके लिए सूर्योदय का नियम देखा जाता है।
अधिकांश परंपराओं में जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि होती है, उसी दिन व्रत रखा जाता है। इसे उदय-तिथि का नियम कहा जाता है। हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में (जैसे वैष्णव और स्मार्त परंपराओं का अंतर) व्रत का दिन बदल सकता है। इसलिए अपने परिवार की परंपरा या स्थानीय पंचांग का पालन करना उचित माना जाता है।
पंचांग में पाँच मुख्य अंग होते हैं —
- तिथि
- वार
- नक्षत्र
- योग
- करण
एकादशी व्रत के लिए मुख्य रूप से तिथि और द्वादशी का ध्यान रखा जाता है। यही कारण है कि बिना पंचांग देखे केवल कैलेंडर के आधार पर व्रत करना कभी-कभी भ्रम पैदा कर सकता है।
इस लेख में 2026 की सभी एकादशी तिथियाँ विश्वसनीय पंचांगों से जाँचकर दी गई हैं, ताकि पाठकों को सही दिन और सही समय की जानकारी मिल सके।
एकादशी पारण क्या है? (सही समय और नियम)
पारण का अर्थ है — व्रत का समापन। एकादशी व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका सही समय पर पारण करना उतना ही आवश्यक माना गया है। यदि पारण विधि से न किया जाए, तो व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता — ऐसा शास्त्रों में बताया गया है।
एकादशी के बाद आने वाली तिथि को द्वादशी कहा जाता है। सामान्य नियम के अनुसार, द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद पारण करना उचित माना जाता है। कुछ पंचांगों में पारण के लिए एक निश्चित समय-सीमा दी जाती है, जिसे पारण मुहूर्त कहा जाता है।
यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाए, तो ऐसी स्थिति में एकादशी के दिन ही उचित समय पर पारण करने का निर्देश मिलता है। यही कारण है कि हर एकादशी का पारण समय अलग-अलग हो सकता है।
पारण करते समय बहुत भारी भोजन नहीं करना चाहिए। परंपरानुसार सबसे पहले जल, फिर फल या हल्का सात्विक भोजन लिया जाता है। अनाज का सेवन उसी दिन किया जा सकता है, जब पारण सही विधि से हो जाए।
एक सामान्य भूल यह होती है कि लोग पारण को अगले दिन कभी भी कर लेते हैं। ऐसा करना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं माना जाता। इसलिए हर एकादशी के लिए स्थानीय पंचांग देखकर पारण समय जानना आवश्यक है।
यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्य कारणों से पूरा उपवास नहीं रख पाया हो, तब भी पारण नियमों का पालन करना चाहिए। इससे व्रत की मर्यादा बनी रहती है।
संक्षेप में, एकादशी व्रत का आरंभ सही तिथि से और समापन सही पारण से होना चाहिए — तभी व्रत पूर्ण और फलदायी माना जाता है।
प्रमुख एकादशी और उनका विशेष महत्व
1. षटतिला एकादशी — महत्व और परंपरा
षटतिला एकादशी माघ मास के कृष्ण पक्ष में आती है और इसका संबंध तिल से बताया गया है। “षट” का अर्थ छह और “तिला” का अर्थ तिल — अर्थात इस दिन तिल से जुड़े छह प्रकार के कर्म (स्नान, उबटन, हवन, दान, भोजन और तर्पण) को शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से पुराने पाप नष्ट होते हैं और पितरों को शांति मिलती है।
परंपरा के अनुसार इस दिन प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। तिल, गुड़, काले तिल या तिल से बने पदार्थों का दान पुण्यकारी माना जाता है। कई घरों में तिल के लड्डू बनाकर दान देने की परंपरा है। षटतिला एकादशी का व्रत विशेषकर उन लोगों के लिए शुभ माना गया है, जो पितृ-दोष या आर्थिक कठिनाइयों से मुक्ति चाहते हैं।
व्रत का पालन करते समय अनाज का त्याग कर फलाहार या उपवास किया जाता है। कथा-श्रवण और दान इस व्रत का मुख्य अंग है। पारण द्वादशी के उचित समय में किया जाता है। इस प्रकार षटतिला एकादशी संयम, दान और शुद्ध आचरण का संदेश देती है।
2. जया एकादशी — मोक्षदायिनी तिथि
जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष में आती है। इसे मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के दोष नष्ट होते हैं और उसे उत्तम गति प्राप्त होती है।
कथाओं के अनुसार जया एकादशी का व्रत करने से कठिन परिस्थितियों से मुक्ति मिलती है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, नाम-स्मरण और कथा-श्रवण विशेष फलदायी माने गए हैं। कई भक्त इस दिन मौन व्रत या संयम का भी पालन करते हैं।
जया एकादशी का महत्व यह भी है कि यह मन को स्थिर करती है और भक्ति की ओर प्रेरित करती है। गृहस्थ जीवन में रहने वाले लोगों के लिए यह व्रत मानसिक शांति और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला माना जाता है। व्रत का पारण द्वादशी तिथि में नियमपूर्वक किया जाता है।
3. आमलकी एकादशी — स्वास्थ्य और दीर्घायु का व्रत
आमलकी एकादशी फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में आती है। इसका संबंध आंवले के वृक्ष से बताया गया है। मान्यता है कि आंवले के वृक्ष में भगवान का वास होता है, इसलिए इस दिन आंवले की पूजा और दान विशेष पुण्यकारी मानी जाती है।
यह एकादशी स्वास्थ्य, दीर्घायु और रोग-नाश के लिए प्रसिद्ध है। व्रती इस दिन आंवले का सेवन करते हैं या उसका दान करते हैं। पूजा के समय आंवले के वृक्ष के नीचे दीपदान और परिक्रमा की परंपरा भी प्रचलित है।
आमलकी एकादशी यह संदेश देती है कि प्रकृति और स्वास्थ्य का सम्मान करना भी धर्म का अंग है। इस व्रत से शरीर और मन दोनों को शुद्धि मिलती है। पारण द्वादशी के नियमानुसार किया जाता है।
4. निर्जला एकादशी — सबसे कठिन और श्रेष्ठ
निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे कठिन और सबसे फलदायी माना जाता है। इस दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता। मान्यता है कि इस एक व्रत से वर्ष की सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाता है।
यह व्रत मुख्य रूप से पाण्डवों से जुड़ा बताया जाता है। जो लोग पूरे वर्ष सभी एकादशी नहीं रख पाते, वे निर्जला एकादशी का व्रत रखकर समस्त एकादशी का फल प्राप्त कर सकते हैं — ऐसा विश्वास है।
निर्जला व्रत केवल स्वस्थ व्यक्ति को ही रखना चाहिए। जो लोग असमर्थ हों, वे फलाहार या जल के साथ व्रत कर सकते हैं। इस दिन दान का विशेष महत्व है, विशेषकर जल, घड़ा और पंखा दान।
यह एकादशी त्याग, संयम और आत्मबल का प्रतीक है। पारण द्वादशी के उचित समय में किया जाता है।
5. देवशयनी एकादशी — चातुर्मास का आरंभ
देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आती है। इस दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और चातुर्मास आरंभ होता है। इस अवधि में विवाह जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते।
यह एकादशी साधना, संयम और आत्मचिंतन का समय बताती है। भक्त इस दिन विशेष पूजा, व्रत और दीपदान करते हैं। देवशयनी एकादशी का व्रत जीवन में अनुशासन और धैर्य सिखाता है।
6. देवउठनी एकादशी — शुभ कार्यों का पुनः आरंभ
देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में आती है। इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसी कारण इसे प्रबोधिनी या देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है।
इस एकादशी के बाद विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य पुनः आरंभ होते हैं। कई स्थानों पर तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है। यह तिथि उत्सव और उल्लास का प्रतीक है।
7. मोक्षदा / वैकुंठ एकादशी — मोक्ष की कामना
मोक्षदा या वैकुंठ एकादशी मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में आती है। मान्यता है कि इस दिन स्वर्ग के द्वार खुलते हैं। इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है — ऐसा विश्वास है।
यह एकादशी अत्यंत पवित्र मानी जाती है। भक्त इस दिन विशेष पूजा, भजन और दान करते हैं। दक्षिण भारत में इसे विशेष श्रद्धा से मनाया जाता है। यह तिथि आत्म-उन्नति और भक्ति का शिखर मानी जाती है।
एकादशी व्रत विधि (सरल और शास्त्रसम्मत)

एकादशी व्रत की विधि सरल है, पर उसमें नियम और श्रद्धा का विशेष महत्व होता है। व्रत का उद्देश्य केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म — तीनों में संयम रखना है। व्रत की शुरुआत एकादशी से एक दिन पहले ही हो जाती है। दशमी तिथि की रात को हल्का और सात्विक भोजन करना चाहिए, ताकि अगले दिन उपवास सहज रहे।
एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। घर के पूजा-स्थान में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएँ। तुलसी दल, पुष्प, धूप और जल अर्पित करें। इसके बाद विष्णु नाम-स्मरण, स्तोत्र पाठ या कथा-श्रवण करें। जिनके पास समय हो, वे पूरे दिन भगवान का ध्यान रखें और क्रोध, कटु वाणी तथा नकारात्मक विचारों से दूर रहें।
व्रत का स्वरूप व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर करता है। कुछ लोग पूर्ण उपवास रखते हैं, कुछ फलाहार करते हैं और कुछ दूध-जल के साथ व्रत करते हैं। व्रत में दान का भी विशेष महत्व है। सामर्थ्य अनुसार अन्न, फल, वस्त्र या धन का दान करना शुभ माना जाता है।
रात में जागरण करना अनिवार्य नहीं है, परंतु यदि संभव हो तो भजन या कथा सुनना लाभकारी माना गया है। अगले दिन द्वादशी तिथि में सही समय पर पारण करना आवश्यक है। पारण के बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। इस प्रकार नियम, श्रद्धा और संयम के साथ किया गया एकादशी व्रत फलदायी होता है।
एकादशी व्रत में क्या खाएं और क्या न खाएं
एकादशी व्रत में आहार नियम का विशेष महत्व है। परंपरानुसार इस दिन अनाज का सेवन वर्जित माना गया है। इसमें चावल, गेहूं, दालें और उनसे बने सभी पदार्थ शामिल हैं। कई परंपराओं में दालों के साथ-साथ कुछ मसाले भी नहीं खाए जाते।
क्या खाएं:
- फल (केला, सेब, पपीता, अनार आदि)
- दूध, दही, छाछ
- मूंगफली, काजू, बादाम (सीमित मात्रा में)
- आलू, शकरकंद, अरबी (सेंधा नमक के साथ)
- साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा
- सेंधा नमक (साधारण नमक के स्थान पर)
क्या न खाएं:
- चावल, गेहूं, दालें
- साधारण नमक
- मांस, मछली, अंडा
- मदिरा और तामसिक भोजन
- अत्यधिक मसालेदार या तला हुआ भोजन
व्रत के दौरान भोजन का उद्देश्य स्वाद नहीं, बल्कि शरीर को आवश्यक ऊर्जा देना है। इसलिए अधिक मात्रा में खाने से बचना चाहिए। जो लोग पूर्ण उपवास नहीं रख पाते, वे फलाहार या दूध के साथ व्रत कर सकते हैं। पारण के समय भी पहले हल्का भोजन लें और फिर सामान्य आहार पर आएँ। इससे शरीर को अचानक बोझ नहीं पड़ता।
निर्जला एकादशी के विशेष नियम
निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे कठिन माना जाता है। इस दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता, इसलिए इसे निर्जला कहा गया है। यह व्रत केवल स्वस्थ व्यक्ति को ही रखना चाहिए। वृद्ध, गर्भवती महिलाएँ, बच्चे और बीमार व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण रूप से न रखें — यह शास्त्रसम्मत और व्यवहारिक दोनों दृष्टि से उचित माना गया है।
निर्जला एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को एक दिन पहले ही शरीर और मन की तैयारी कर लेनी चाहिए। दशमी की रात हल्का भोजन करें और अधिक नमक या मसाले से बचें। एकादशी के दिन सुबह पूजा कर व्रत का संकल्प लें। दिनभर धूप, अधिक श्रम और क्रोध से बचना चाहिए।
इस दिन जल दान का विशेष महत्व बताया गया है। घड़ा, मटका, पानी, पंखा और छाया का दान पुण्यकारी माना जाता है। जो लोग निर्जला व्रत नहीं रख सकते, वे जल के साथ व्रत कर सकते हैं और दान-पुण्य से उसका फल प्राप्त कर सकते हैं।
निर्जला एकादशी यह सिखाती है कि त्याग और संयम से आत्मबल बढ़ता है। परंतु स्वास्थ्य से बढ़कर कोई व्रत नहीं होता। इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार ही व्रत करना श्रेष्ठ माना गया है। पारण अगले दिन द्वादशी में उचित समय पर करना अनिवार्य है।
महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग एकादशी व्रत कैसे रखें
एकादशी व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन और आत्मा को शुद्ध करना है। शास्त्रों में भी स्पष्ट कहा गया है कि धर्म विवेक और करुणा के साथ किया जाना चाहिए। इसलिए महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए व्रत के नियमों में सरलता और संतुलन आवश्यक माना गया है।
महिलाएं यदि गर्भवती हों या स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो, तो कठोर उपवास न करें। वे फलाहार, दूध या हल्का सात्विक भोजन लेकर व्रत कर सकती हैं। कई परंपराओं में मासिक धर्म के समय व्रत न रखने की मान्यता है। ऐसे समय केवल भगवान विष्णु का स्मरण, नाम-जप और मानसिक श्रद्धा को ही पर्याप्त माना गया है।
बच्चों के लिए पूर्ण उपवास उचित नहीं माना जाता। छोटे बच्चे अनाज का त्याग कर फल या दूध ले सकते हैं। इससे उनमें धार्मिक संस्कार विकसित होते हैं और शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। बच्चों को व्रत का महत्व प्रेम और सरल शब्दों में समझाना चाहिए, ताकि धर्म भय नहीं, बल्कि श्रद्धा का विषय बने।
बुजुर्गों को अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही व्रत रखना चाहिए। यदि दवा या नियमित भोजन आवश्यक हो, तो केवल अनाज का त्याग कर पूजा-पाठ और दान करें। शास्त्रों में स्पष्ट है कि स्वास्थ्य से बढ़कर कोई व्रत नहीं होता।
इस प्रकार महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए एकादशी व्रत आत्मिक श्रद्धा के साथ, शरीर की सीमा को समझते हुए करना ही श्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत माना गया है।
एकादशी व्रत में होने वाली सामान्य गलतियाँ
एकादशी व्रत श्रद्धा और नियम से किया जाए, तभी उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है। लेकिन कई बार जानकारी के अभाव या गलत धारणाओं के कारण कुछ सामान्य भूलें हो जाती हैं।
सबसे बड़ी गलती है बिना पंचांग देखे व्रत रखना। केवल मोबाइल कैलेंडर या सोशल मीडिया पोस्ट देखकर तिथि मान लेना भ्रम पैदा कर सकता है। एकादशी का निर्धारण तिथि से होता है, तारीख से नहीं।
दूसरी आम गलती है पारण का सही समय न मानना। कई लोग द्वादशी में देर से या कभी भी पारण कर लेते हैं, जबकि शास्त्रों में निश्चित पारण समय का विशेष महत्व बताया गया है।
कुछ लोग यह मान लेते हैं कि व्रत का अर्थ केवल भूखा रहना है। जबकि एकादशी व्रत में क्रोध, निंदा, असत्य और असंयम से बचना उतना ही आवश्यक है। केवल भोजन त्याग कर मन को अशुद्ध रखना व्रत की भावना के विरुद्ध माना गया है।
एक और गलती है पारण के बाद अत्यधिक भोजन करना, जिससे शरीर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पारण हमेशा हल्के और सात्विक भोजन से करना चाहिए।
इसके अलावा, स्वास्थ्य के विरुद्ध जाकर निर्जला व्रत रखना भी एक गंभीर भूल मानी जाती है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि व्रत विवेकपूर्वक होना चाहिए।
इन गलतियों से बचकर किया गया एकादशी व्रत ही वास्तव में फलदायी और पुण्यकारी माना जाता है।
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❓ एकादशी 2026 से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: एकादशी 2026 में कुल कितनी एकादशी होंगी?
उत्तर: वर्ष 2026 में हिन्दू पंचांग के अनुसार कुल 24 एकादशी होंगी। प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में एक-एक एकादशी आती है। कुछ वर्षों में अधिक मास होने पर एकादशी की संख्या बढ़ सकती है, लेकिन 2026 में सामान्य स्थिति है। इन 24 एकादशियों में कुछ विशेष एकादशी जैसे निर्जला, देवउठनी और मोक्षदा को अधिक महत्व दिया गया है। सभी एकादशी का व्रत समान नियमों के साथ रखा जाता है, लेकिन कुछ के नियम विशेष होते हैं।
प्रश्न 2: एकादशी का व्रत क्यों रखा जाता है?
उत्तर: एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत से पापों का नाश होता है और मन शुद्ध होता है। एकादशी केवल उपवास नहीं, बल्कि संयम और आत्मनियंत्रण का अभ्यास है। इस दिन सात्विक भोजन, पूजा और दान करने से मानसिक शांति मिलती है। शास्त्रों में एकादशी को मोक्ष प्राप्ति का साधन भी बताया गया है, इसलिए इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
प्रश्न 3: एकादशी व्रत में क्या खाना चाहिए?
उत्तर: एकादशी व्रत में सामान्यतः अनाज का त्याग किया जाता है। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक व्रत में स्वीकार्य माने जाते हैं। भोजन हल्का और सात्विक होना चाहिए। व्रत का उद्देश्य स्वाद नहीं, बल्कि शरीर को आवश्यक ऊर्जा देना होता है। जो लोग पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, वे फलाहार के साथ व्रत कर सकते हैं।
प्रश्न 4: एकादशी पर क्या नहीं खाना चाहिए?
उत्तर: एकादशी के दिन चावल, गेहूं, दालें और उनसे बने सभी खाद्य पदार्थ वर्जित माने जाते हैं। साधारण नमक, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन भी नहीं लेना चाहिए। अत्यधिक तला-भुना या मसालेदार भोजन व्रत की भावना के विरुद्ध माना जाता है। इन नियमों का पालन करने से व्रत शुद्ध और फलदायी होता है।
प्रश्न 5: एकादशी पारण क्या होता है?
उत्तर: पारण का अर्थ है व्रत का समापन। एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में किया जाता है। पारण का सही समय पंचांग देखकर ही तय करना चाहिए। बिना पारण किए व्रत अधूरा माना जाता है। पारण हमेशा हल्के और सात्विक भोजन से करना चाहिए, ताकि शरीर पर अचानक बोझ न पड़े।
प्रश्न 6: निर्जला एकादशी क्या है और इसे कौन रख सकता है?
उत्तर: निर्जला एकादशी सबसे कठिन मानी जाती है, क्योंकि इसमें जल तक ग्रहण नहीं किया जाता। यह व्रत केवल स्वस्थ व्यक्ति को ही रखना चाहिए। वृद्ध, गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग निर्जला व्रत न रखें। धार्मिक मान्यता है कि इस एक व्रत से वर्ष की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है।
प्रश्न 7: एकादशी व्रत से क्या लाभ होते हैं?
उत्तर: एकादशी व्रत से मानसिक शांति, आत्मनियंत्रण और सकारात्मकता मिलती है। धार्मिक दृष्टि से इसे पाप नाश और पुण्य प्राप्ति का साधन माना गया है। व्यवहारिक रूप से यह शरीर को विश्राम देता है और अनुशासन सिखाता है। श्रद्धा के साथ किया गया एकादशी व्रत जीवन में संतुलन लाता है।
निष्कर्ष
एकादशी व्रत हिन्दू धर्म की एक महत्वपूर्ण और पवित्र परंपरा है। यह व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि संयम, श्रद्धा और आत्मशुद्धि का मार्ग है। वर्ष 2026 में आने वाली सभी 24 एकादशियाँ अपने-अपने महत्व और फल के कारण विशेष हैं।
इस लेख में एकादशी 2026 की सम्पूर्ण सूची, सही तिथियाँ, पारण समय, व्रत विधि और आहार नियमों को पंचांग अनुसार सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठकों को किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
यदि कोई व्यक्ति पूरे वर्ष सभी एकादशी नहीं रख सकता, तो भी वह निर्जला, देवउठनी और मोक्षदा जैसी प्रमुख एकादशियों का व्रत रखकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है। वहीं, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपनी क्षमता के अनुसार सरल नियम अपनाकर व्रत कर सकते हैं।
एकादशी व्रत का वास्तविक उद्देश्य मन को शुद्ध करना और जीवन में संतुलन लाना है। श्रद्धा, सही जानकारी और विवेक के साथ किया गया व्रत निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम देता है।


