
भूमिका (Introduction)
हिंदू धर्म में व्रत-उपवास केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन को संयमित, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण बनाने की साधना माने जाते हैं। इन्हीं व्रतों में एकादशी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष में आने वाली एकादशियों में पुत्रदा एकादशी व्रत को विशेष फलदायी माना गया है। यह व्रत संतान-सुख, पारिवारिक स्थिरता और मानसिक संतुलन से जुड़ा हुआ है।
शास्त्रों में कहा गया है कि श्रद्धा, नियम और भक्ति के साथ किया गया पुत्रदा एकादशी व्रत भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त कराने वाला होता है। यह व्रत न केवल संतान-प्राप्ति की कामना से जुड़ा है, बल्कि संतान के अच्छे संस्कार, स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना का माध्यम भी है।
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पुत्रदा एकादशी क्या है? (अर्थ और पृष्ठभूमि)
“पुत्रदा” का अर्थ है—पुत्र प्रदान करने वाली। यह एकादशी संतान-सुख की कामना से जुड़ी हुई है। वर्ष में यह व्रत दो बार आता है—
- पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी
- श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी
इनमें पौष मास की पुत्रदा एकादशी को विशेष महत्व दिया गया है, क्योंकि यह शीत ऋतु में आती है और वर्ष की शुरुआत में संयम व साधना का अवसर देती है। पौष मास का वातावरण स्थिरता और शांति का प्रतीक माना गया है, जिससे इस व्रत का आध्यात्मिक प्रभाव और गहरा हो जाता है।
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पुत्रदा एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व
धार्मिक दृष्टि से पुत्रदा एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता माना गया है और एकादशी तिथि उन्हें अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि इस दिन उपवास और विष्णु-पूजन करने से संतान-संबंधी बाधाएं दूर होती हैं।
यह व्रत केवल संतान-प्राप्ति तक सीमित नहीं, बल्कि संतान के अच्छे चरित्र, बुद्धि और स्वास्थ्य की कामना से भी जुड़ा है। एकादशी का उपवास इंद्रियों पर संयम स्थापित करता है, जिससे व्यक्ति का मन शुद्ध और स्थिर होता है।
पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (पौराणिक प्रसंग)
पुराणों के अनुसार भद्रावती नामक नगरी में सुकर्मा नामक एक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। राजा और रानी सभी प्रकार से सुखी थे, परंतु उन्हें संतान-सुख प्राप्त नहीं था। इस कारण वे अत्यंत दुखी रहते थे।
एक दिन राजा वन में गया और ऋषि-मुनियों से एकादशी व्रत का महत्व सुना। ऋषियों ने उसे पुत्रदा एकादशी व्रत करने की सलाह दी। राजा ने रानी सहित श्रद्धा और विधि-विधान से पुत्रदा एकादशी व्रत किया। भगवान विष्णु उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें एक तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया। तभी से यह विश्वास प्रचलित हुआ कि यह व्रत संतान-सुख प्रदान करता है।
पुत्रदा एकादशी व्रत विधि (Step-by-Step)
व्रत की पूर्व-तैयारी
- एक दिन पहले सात्विक भोजन
- तामसिक आहार से परहेज
- मन में शुद्ध संकल्प
व्रत के दिन
- ब्रह्ममुहूर्त में स्नान
- भगवान विष्णु का स्मरण
- व्रत का संकल्प
- निर्जल या फलाहार (सामर्थ्य अनुसार)
पूजा विधि
- विष्णु प्रतिमा/चित्र की स्थापना
- तुलसी दल, पीले पुष्प अर्पण
- विष्णु सहस्रनाम या मंत्र-जप
रात्रि जागरण
- भजन-कीर्तन
- विष्णु कथा श्रवण
पारण विधि
- द्वादशी को प्रातः स्नान
- दान या ब्राह्मण-भोजन
- सात्विक भोजन से पारण

पुत्रदा एकादशी व्रत के नियम
- सत्य और संयम का पालन
- क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूरी
- शुद्ध आचरण
- वाणी और व्यवहार में सौम्यता
पुत्रदा एकादशी व्रत का आध्यात्मिक महत्व
आध्यात्मिक रूप से यह व्रत आत्मसंयम और भक्ति का अभ्यास है। उपवास से इंद्रियां नियंत्रित होती हैं और ध्यान-जप से मन एकाग्र होता है। संतान-सुख की कामना के साथ यह व्रत व्यक्ति को अपने कर्तव्यों और मूल्यों पर भी विचार करने की प्रेरणा देता है।
सामाजिक और पारिवारिक महत्व
यह व्रत परिवार में आशा और विश्वास का संचार करता है। माता-पिता और संतान के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होते हैं। सामाजिक दृष्टि से यह व्रत पारिवारिक संस्कारों और जिम्मेदारियों की याद दिलाता है।
आधुनिक जीवन में पुत्रदा एकादशी की प्रासंगिकता
आज के तनावपूर्ण जीवन में यह व्रत धैर्य और मानसिक स्थिरता प्रदान करता है। यह याद दिलाता है कि जीवन में संयम और विश्वास से कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है। संतान-सुख की कामना के साथ-साथ यह व्रत आत्मविकास का माध्यम भी बनता है।
मुख्य सीख (Key Takeaways)
- संयम और श्रद्धा का महत्व
- संतान-सुख के साथ अच्छे संस्कार
- धैर्य और विश्वास की शक्ति
- भक्ति और कर्तव्य का संतुलन
निष्कर्ष (Conclusion)
पुत्रदा एकादशी व्रत संतान-सुख, पारिवारिक स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति का संगम है। यह व्रत हमें सिखाता है कि श्रद्धा, संयम और विश्वास से जीवन की कठिन कामनाएँ भी पूर्ण हो सकती हैं। विधिपूर्वक किया गया पुत्रदा एकादशी व्रत परिवार में सुख, शांति और संतुलन लाने वाला माना गया है।
❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: पुत्रदा एकादशी व्रत कब किया जाता है?
उत्तर: पौष शुक्ल पक्ष और श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को।
प्रश्न 1: क्या यह व्रत केवल संतान-प्राप्ति के लिए है?
उत्तर: नहीं, यह संतान के स्वास्थ्य, संस्कार और पारिवारिक शांति के लिए भी किया जाता है।
प्रश्न 1: पुत्रदा एकादशी में क्या दान करना चाहिए?
उत्तर: अन्न, वस्त्र, फल या सामर्थ्य अनुसार धन।
प्रश्न 1: क्या निर्जल व्रत अनिवार्य है?
उत्तर: नहीं, स्वास्थ्य अनुसार फलाहार किया जा सकता है।


