नवरात्रि में कन्या पूजन कैसे करें? जानिए अष्टमी और नवमी के दिन कन्या पूजन की सही विधि, नियम, महत्व और भोजन की पूरी जानकारी।

नवरात्रि में कन्या पूजन देवी दुर्गा की आराधना का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अष्टमी या नवमी के दिन छोटी कन्याओं को माँ दुर्गा का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। इस पूजा में कन्याओं के चरण धोकर उन्हें भोजन कराया जाता है और आशीर्वाद लिया जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से कन्या पूजन करने से माँ दुर्गा प्रसन्न होती हैं और घर में सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद देती हैं।
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नवरात्रि में कन्या पूजन क्या होता है? जानें इसका धार्मिक महत्व
नवरात्रि के पावन पर्व में कन्या पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। हिंदू धर्म में छोटी कन्याओं को माँ दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। इसी कारण नवरात्रि के दौरान अष्टमी या नवमी के दिन छोटी कन्याओं की पूजा की जाती है और उन्हें देवी का रूप मानकर सम्मान दिया जाता है। इस परंपरा को ही कन्या पूजन या कंजक पूजन कहा जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है। इन नौ रूपों की प्रतीक स्वरूप नौ कन्याओं को आमंत्रित करके उनका पूजन किया जाता है। माना जाता है कि जब भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ कन्याओं का पूजन करते हैं, तो यह सीधे माँ दुर्गा की पूजा के समान फल देता है। इसलिए इस दिन कन्याओं के चरण धोकर उनका तिलक किया जाता है, उन्हें भोजन कराया जाता है और उपहार या दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।
कन्या पूजन केवल एक धार्मिक परंपरा ही नहीं है, बल्कि यह नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक भी माना जाता है। इस परंपरा के माध्यम से समाज में यह संदेश दिया जाता है कि स्त्री शक्ति का सम्मान करना अत्यंत आवश्यक है। छोटी कन्याओं में देवी शक्ति का वास माना जाता है, इसलिए उनकी सेवा और पूजा को अत्यंत पुण्यदायक माना गया है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार विधि-विधान से कन्या पूजन करने से माँ दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं। इससे भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। ऐसा माना जाता है कि कन्या पूजन करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
इसी कारण नवरात्रि के पावन दिनों में कन्या पूजन को विशेष महत्व दिया जाता है और भक्त पूरे श्रद्धा भाव के साथ इस पवित्र परंपरा का पालन करते हैं।
नवरात्रि में कन्या पूजन कब किया जाता है? जानिए सही दिन
नवरात्रि के पावन पर्व में कन्या पूजन मुख्य रूप से दुर्गा अष्टमी और महानवमी के दिन किया जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दोनों तिथियों का विशेष महत्व होता है, इसलिए भक्त इन दिनों छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन करते हैं और उन्हें भोजन कराते हैं।
आमतौर पर दुर्गा अष्टमी के दिन कन्या पूजन करने की परंपरा अधिक प्रचलित है। इस दिन भक्त माँ दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और नौ छोटी कन्याओं को घर बुलाकर उनका आदर-सम्मान करते हैं। माना जाता है कि अष्टमी के दिन विधि-विधान से कन्या पूजन करने से माँ दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं।
कुछ स्थानों और परिवारों में महानवमी के दिन भी कन्या पूजन किया जाता है। कई लोग अष्टमी और नवमी दोनों दिन कन्या पूजन करते हैं। धार्मिक दृष्टि से दोनों ही दिन शुभ माने जाते हैं और इन दिनों देवी की पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है। इसलिए यदि किसी कारण से अष्टमी के दिन कन्या पूजन नहीं हो पाता, तो नवमी के दिन भी श्रद्धा और भक्ति के साथ यह पूजा की जा सकती है।
कन्या पूजन करते समय छोटी कन्याओं को देवी शक्ति का प्रतीक मानकर उनका सम्मान किया जाता है। इस दौरान कन्याओं के चरण धोए जाते हैं, उनके माथे पर तिलक लगाया जाता है और उन्हें प्रसाद के रूप में पारंपरिक भोजन कराया जाता है। अंत में उन्हें उपहार या दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि अष्टमी या नवमी के दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ कन्या पूजन करने से माँ दुर्गा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इससे घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है और जीवन की कई बाधाएँ दूर हो जाती हैं।
कन्या पूजन के लिए किन कन्याओं को बुलाया जाता है?
नवरात्रि के दौरान होने वाले कन्या पूजन में छोटी कन्याओं को माँ दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। इसलिए इस पूजा के लिए सामान्यतः 2 वर्ष से 10 वर्ष की आयु की कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस आयु की बालिकाएँ शुद्धता, मासूमियत और देवी शक्ति का प्रतीक होती हैं, इसलिए उनका पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
परंपरा के अनुसार कन्या पूजन में नौ कन्याओं को बैठाकर उनका पूजन किया जाता है। ये नौ कन्याएँ माँ दुर्गा के नवदुर्गा रूपों का प्रतीक मानी जाती हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है, इसलिए कन्या पूजन में नौ कन्याओं को आमंत्रित करने की परंपरा प्रचलित है।
कई स्थानों पर कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी बैठाया जाता है, जिसे लंगूर या भैरव स्वरूप कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान भैरव माँ दुर्गा के रक्षक माने जाते हैं, इसलिए कन्या पूजन के समय उनके प्रतीक के रूप में एक बालक को भी भोजन कराया जाता है। इस प्रकार नौ कन्याएँ और एक बालक मिलकर पूजा को पूर्ण बनाते हैं।
कन्या पूजन के लिए आमंत्रित की जाने वाली कन्याएँ किसी भी जाति या परिवार से हो सकती हैं। इस पूजा का मुख्य उद्देश्य देवी शक्ति का सम्मान करना और छोटी बालिकाओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना होता है। इसलिए कन्याओं को प्रेम और आदर के साथ घर बुलाया जाता है और उन्हें देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है।
कन्या पूजन के दौरान कन्याओं के चरण धोकर उन्हें आसन पर बैठाया जाता है, उनके माथे पर तिलक लगाया जाता है और उन्हें प्रसाद के रूप में पारंपरिक भोजन कराया जाता है। अंत में उन्हें उपहार या दक्षिणा देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।
कन्या पूजन में कितनी कन्याएँ बैठाई जाती हैं?
नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले कन्या पूजन में परंपरागत रूप से नौ कन्याओं को बैठाकर उनका पूजन किया जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार ये नौ कन्याएँ माँ दुर्गा के नवदुर्गा रूपों का प्रतीक मानी जाती हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, इसलिए कन्या पूजन में नौ कन्याओं को आमंत्रित करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है।
इन नौ कन्याओं को घर बुलाकर उन्हें सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया जाता है और पूरे श्रद्धा भाव से उनका पूजन किया जाता है। पूजा के दौरान कन्याओं के चरण धोए जाते हैं, उनके माथे पर तिलक लगाया जाता है और उन्हें प्रसाद के रूप में पारंपरिक भोजन कराया जाता है। इस प्रकार कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका आदर किया जाता है।
कई स्थानों पर नौ कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी बैठाया जाता है, जिसे लंगूर कहा जाता है। यह बालक भगवान भैरव का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भैरव भगवान माँ दुर्गा के रक्षक हैं, इसलिए कन्या पूजन के समय उनके प्रतीक स्वरूप एक बालक को भी भोजन कराया जाता है। इस प्रकार नौ कन्याएँ और एक बालक मिलकर पूजा को पूर्ण बनाते हैं।
हालाँकि यदि किसी कारण से नौ कन्याएँ उपलब्ध न हो पाएं, तो कुछ लोग एक या दो कन्याओं का पूजन भी श्रद्धा भाव से करते हैं। धार्मिक दृष्टि से पूजा का मुख्य महत्व संख्या से अधिक भक्ति और श्रद्धा में माना जाता है। इसलिए भक्त जितनी कन्याओं को आमंत्रित कर सकें, उतनी कन्याओं का सम्मानपूर्वक पूजन कर सकते हैं।
इस प्रकार नवरात्रि के पावन दिनों में कन्या पूजन के माध्यम से देवी शक्ति का सम्मान किया जाता है और भक्त माँ दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
नवरात्रि में कन्या पूजन कैसे करें? जानें सही विधि
नवरात्रि के पावन अवसर पर कन्या पूजन को अत्यंत शुभ और पुण्यदायक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि कन्या पूजन सही विधि और श्रद्धा भाव से किया जाए, तो माँ दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं और भक्तों को सुख, समृद्धि और सौभाग्य का आशीर्वाद देती हैं। इसलिए कन्या पूजन करते समय पारंपरिक विधि का पालन करना आवश्यक माना जाता है।
🔹 कन्याओं को आमंत्रित करना
कन्या पूजन के लिए सबसे पहले 2 से 10 वर्ष की आयु की छोटी कन्याओं को सम्मानपूर्वक घर बुलाया जाता है। सामान्यतः नौ कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है, जो माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानी जाती हैं। कई स्थानों पर कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी बुलाया जाता है, जिसे भैरव का स्वरूप माना जाता है।
🔹 चरण धोकर सम्मान करना
जब कन्याएँ घर आती हैं, तो सबसे पहले उन्हें सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया जाता है। इसके बाद श्रद्धा के साथ उनके चरण धोए जाते हैं। यह परंपरा सम्मान और सेवा का प्रतीक मानी जाती है। चरण धोने के बाद उनके चरणों को साफ कपड़े से पोंछा जाता है।
🔹 तिलक और पूजा करना
इसके बाद कन्याओं के माथे पर कुमकुम या रोली से तिलक लगाया जाता है और अक्षत चढ़ाए जाते हैं। कई लोग इस समय देवी मंत्रों का उच्चारण भी करते हैं। इसके बाद कन्याओं को फूल अर्पित किए जाते हैं और माँ दुर्गा का स्मरण करते हुए उनका पूजन किया जाता है।
🔹 भोजन कराना
कन्या पूजन में कन्याओं को पारंपरिक प्रसाद के रूप में भोजन कराया जाता है। आमतौर पर पूरी, काला चना और हलवा का प्रसाद तैयार किया जाता है। यह भोजन अत्यंत शुभ माना जाता है और नवरात्रि में कन्या पूजन के दौरान यही प्रसाद अधिकतर घरों में दिया जाता है।
🔹 दक्षिणा और उपहार देना
भोजन के बाद कन्याओं को प्रेम और सम्मान के साथ दक्षिणा, फल या छोटा उपहार दिया जाता है। इसके बाद उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लिया जाता है और उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस प्रकार श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया कन्या पूजन माँ दुर्गा को अत्यंत प्रिय होता है।
कन्या पूजन में क्या भोजन कराया जाता है? जानिए पारंपरिक प्रसाद
नवरात्रि के दौरान होने वाले कन्या पूजन में कन्याओं को भोजन कराना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कन्याओं को माँ दुर्गा का स्वरूप मानकर उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ भोजन कराया जाता है। यह भोजन केवल साधारण भोजन नहीं होता, बल्कि इसे प्रसाद माना जाता है, जिसे भक्त पूरे श्रद्धा भाव से तैयार करते हैं।
परंपरागत रूप से कन्या पूजन में पूरी, काला चना और हलवा का प्रसाद बनाया जाता है। यह भोजन नवरात्रि में विशेष रूप से शुभ माना जाता है और लगभग पूरे भारत में यही प्रसाद कन्याओं को खिलाने की परंपरा प्रचलित है। सबसे पहले कन्याओं को आसन पर बैठाया जाता है और फिर उन्हें प्रेमपूर्वक यह प्रसाद परोसा जाता है।
पूरी को समृद्धि और पूर्णता का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ परोसा जाने वाला काला चना शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। वहीं सूजी या आटे का हलवा मिठास और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इन तीनों व्यंजनों को मिलाकर कन्या पूजन का प्रसाद पूर्ण माना जाता है।
कई स्थानों पर प्रसाद के साथ कन्याओं को फल, मिठाई या नारियल भी दिया जाता है। कुछ लोग प्रसाद के साथ पानी या मीठा पेय भी परोसते हैं। भोजन कराते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि कन्याओं को प्रेम और सम्मान के साथ भोजन कराया जाए और उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न हो।
धार्मिक मान्यता है कि जब कन्याओं को श्रद्धा और भक्ति के साथ भोजन कराया जाता है, तो यह सीधे माँ दुर्गा को अर्पित किए गए प्रसाद के समान माना जाता है। इसलिए कन्या पूजन के दौरान भोजन बनाते समय स्वच्छता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
इस प्रकार नवरात्रि के पावन दिनों में कन्याओं को प्रसाद के रूप में भोजन कराना देवी की पूजा का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है और इससे भक्तों को माँ दुर्गा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
कन्या पूजन करते समय किन नियमों का पालन करना चाहिए?
नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन एक अत्यंत पवित्र धार्मिक परंपरा मानी जाती है। इसलिए इस पूजा को करते समय कुछ महत्वपूर्ण नियमों का पालन करना आवश्यक माना जाता है। इन नियमों का उद्देश्य यह है कि पूजा पूरी श्रद्धा, स्वच्छता और सम्मान के साथ संपन्न हो सके और माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त हो।
सबसे पहले कन्या पूजन करते समय स्वच्छता और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। जिस स्थान पर पूजा की जा रही हो, वह स्थान साफ-सुथरा होना चाहिए। भोजन बनाने से पहले स्नान करना और साफ वस्त्र पहनना भी शुभ माना जाता है। इससे पूजा की पवित्रता बनी रहती है।
कन्या पूजन के लिए आमंत्रित की गई कन्याओं का सम्मान और आदर करना बहुत आवश्यक है। उन्हें देवी का स्वरूप मानकर प्रेम और श्रद्धा के साथ घर बुलाना चाहिए। जब कन्याएँ घर आएँ, तो उन्हें सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया जाए और उनके चरण धोकर उनका तिलक किया जाए।
कन्याओं को भोजन कराते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि सबसे पहले उन्हें प्रसाद दिया जाए। जब तक कन्याएँ भोजन न कर लें, तब तक घर के अन्य सदस्य भोजन नहीं करते। यह परंपरा सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है।
इसके अलावा कन्या पूजन करते समय क्रोध, अहंकार या दिखावा नहीं होना चाहिए। पूजा का मुख्य उद्देश्य केवल धार्मिक कर्तव्य निभाना नहीं, बल्कि देवी शक्ति के प्रति सच्ची श्रद्धा और भक्ति प्रकट करना है। इसलिए कन्या पूजन हमेशा शांत मन और श्रद्धा भाव से करना चाहिए।
भोजन के बाद कन्याओं को दक्षिणा, फल या छोटा उपहार देकर सम्मानपूर्वक विदा करना भी आवश्यक माना जाता है। अंत में उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन नियमों का पालन करते हुए किया गया कन्या पूजन माँ दुर्गा को अत्यंत प्रिय होता है और भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
नवरात्रि में कन्या पूजन का आध्यात्मिक महत्व
नवरात्रि के पावन पर्व में कन्या पूजन का केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक महत्व भी माना जाता है। हिंदू धर्म में स्त्री शक्ति को देवी का स्वरूप माना गया है और छोटी कन्याओं को उस शक्ति का सबसे पवित्र रूप समझा जाता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान कन्याओं की पूजा करके देवी शक्ति का सम्मान किया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इसी कारण कन्या पूजन में नौ कन्याओं को देवी के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। जब भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ कन्याओं का पूजन करते हैं, तो यह माँ दुर्गा की आराधना के समान माना जाता है। इससे भक्तों को देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
कन्या पूजन के माध्यम से यह संदेश भी दिया जाता है कि समाज में नारी शक्ति का सम्मान करना अत्यंत आवश्यक है। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि स्त्रियों और बालिकाओं को आदर और सम्मान देना चाहिए, क्योंकि उनमें भी देवी शक्ति का वास माना जाता है। इसलिए कन्या पूजन केवल एक पूजा विधि नहीं, बल्कि समाज में सम्मान और समानता की भावना को बढ़ाने वाली परंपरा भी है।
आध्यात्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जब भक्त श्रद्धा और शुद्ध मन से कन्या पूजन करते हैं, तो उनके जीवन की कई बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक शक्तियाँ समाप्त होती हैं। कई लोग यह भी मानते हैं कि कन्या पूजन करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
इस प्रकार नवरात्रि के दौरान किया गया कन्या पूजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह देवी शक्ति के प्रति श्रद्धा, भक्ति और सम्मान प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
कन्या पूजन से मिलने वाले शुभ फल
नवरात्रि के दौरान श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया कन्या पूजन अत्यंत शुभ और पुण्यदायक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब भक्त छोटी कन्याओं को माँ दुर्गा का स्वरूप मानकर उनका पूजन करते हैं, तो उन्हें देवी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसलिए नवरात्रि के पावन दिनों में कन्या पूजन को बहुत महत्व दिया जाता है।
सबसे पहले माना जाता है कि कन्या पूजन करने से माँ दुर्गा प्रसन्न होती हैं और भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। जो लोग सच्चे मन और श्रद्धा के साथ कन्याओं का पूजन करते हैं, उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। देवी की कृपा से परिवार में खुशहाली बनी रहती है और कई प्रकार की परेशानियाँ दूर हो जाती हैं।
कन्या पूजन का एक महत्वपूर्ण फल यह भी माना जाता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जब भक्त श्रद्धा के साथ कन्याओं का सम्मान करते हैं और उन्हें भोजन कराते हैं, तो इससे घर का वातावरण पवित्र और शुभ बनता है। धार्मिक मान्यता है कि इससे नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम हो जाता है।
इसके अलावा कन्या पूजन करने से धन, सौभाग्य और सफलता की प्राप्ति भी होती है। कई लोग यह विश्वास रखते हैं कि नवरात्रि में विधि-विधान से कन्या पूजन करने से जीवन में आने वाली बाधाएँ दूर हो जाती हैं और व्यक्ति को अपने कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
कन्या पूजन का एक और महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे मन में भक्ति और श्रद्धा की भावना बढ़ती है। यह परंपरा हमें देवी शक्ति के प्रति आस्था बनाए रखने और समाज में नारी सम्मान के महत्व को समझने की प्रेरणा देती है।
इस प्रकार नवरात्रि के दौरान श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया कन्या पूजन भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक शांति लेकर आता है।
❓ नवरात्रि कन्या पूजन से जुड़े 7 महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
प्रश्न 1. कन्या पूजन किस दिन करना चाहिए?
उत्तर: नवरात्रि में कन्या पूजन मुख्य रूप से दुर्गा अष्टमी या महानवमी के दिन किया जाता है। कई स्थानों पर लोग अष्टमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, जबकि कुछ लोग नवमी के दिन यह पूजा करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार दोनों ही दिन देवी दुर्गा की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं। इसलिए भक्त अपनी परंपरा और सुविधा के अनुसार अष्टमी या नवमी के दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ कन्या पूजन कर सकते हैं।
प्रश्न 2. कन्या पूजन में कितनी कन्याएँ बैठाई जाती हैं?
उत्तर: परंपरा के अनुसार कन्या पूजन में नौ कन्याओं को बैठाकर उनका पूजन किया जाता है। ये नौ कन्याएँ माँ दुर्गा के नवदुर्गा रूपों का प्रतीक मानी जाती हैं। कई स्थानों पर नौ कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी बैठाया जाता है, जिसे लंगूर या भैरव स्वरूप माना जाता है। इस प्रकार नौ कन्याएँ और एक बालक मिलकर पूजा को पूर्ण बनाते हैं।
प्रश्न 3. कन्या पूजन में क्या खिलाया जाता है?
उत्तर: कन्या पूजन में पारंपरिक रूप से पूरी, काला चना और हलवा का प्रसाद बनाया जाता है। यह भोजन नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से शुभ माना जाता है। कई लोग प्रसाद के साथ फल, मिठाई या नारियल भी देते हैं। कन्याओं को प्रेम और सम्मान के साथ यह प्रसाद खिलाया जाता है।
प्रश्न 4. क्या नवमी के दिन भी कन्या पूजन किया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, यदि किसी कारण से अष्टमी के दिन कन्या पूजन नहीं हो पाता, तो महानवमी के दिन भी कन्या पूजन किया जा सकता है। धार्मिक दृष्टि से अष्टमी और नवमी दोनों ही दिन देवी पूजा के लिए अत्यंत शुभ माने जाते हैं। इसलिए भक्त इन दोनों में से किसी भी दिन श्रद्धा के साथ कन्या पूजन कर सकते हैं।
प्रश्न 5. कन्या पूजन क्यों किया जाता है?
उत्तर: हिंदू धर्म में छोटी कन्याओं को माँ दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान कन्याओं की पूजा करके देवी शक्ति का सम्मान किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि कन्या पूजन करने से माँ दुर्गा प्रसन्न होती हैं और भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
प्रश्न 6. कन्या पूजन में लंगूर क्यों बैठाया जाता है?
उत्तर: कई स्थानों पर कन्या पूजन के दौरान एक छोटे बालक को भी बैठाया जाता है, जिसे लंगूर कहा जाता है। यह बालक भगवान भैरव का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान भैरव माँ दुर्गा के रक्षक माने जाते हैं, इसलिए कन्या पूजन के समय उनके प्रतीक के रूप में एक बालक को भी भोजन कराया जाता है।
प्रश्न 7. कन्या पूजन के बाद क्या करना चाहिए?
उत्तर: कन्या पूजन के बाद कन्याओं को दक्षिणा, फल या छोटा उपहार देकर सम्मानपूर्वक विदा करना चाहिए। इसके बाद उनके चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लिया जाता है। कई लोग कन्याओं के जाने के बाद परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करते हैं और माँ दुर्गा का स्मरण करते हुए पूजा को पूर्ण करते हैं।
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Suman Kumar भारतीय संस्कृति, धर्म, व्रत-त्योहार और सनातन परंपराओं पर शोध आधारित लेख लिखते हैं।
SanskritiSaar के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान को सरल हिंदी में प्रस्तुत करते हैं।


