मार्च 2026 में हिन्दू पंचांग के अनुसार होलिका दहन, होली, संकष्टी चतुर्थी, पापमोचनी एकादशी, कामदा एकादशी, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, गुड़ी पड़वा, उगादी, चेटी चंद और राम नवमी जैसे प्रमुख व्रत-त्योहार पड़ते हैं। यह महीना फाल्गुन मास के अंत और चैत्र मास की शुरुआत का समय होता है, इसलिए इसमें उत्सव और व्रत — दोनों का विशेष महत्व रहता है।

Table of Contents
मार्च 2026 के सभी प्रमुख हिन्दू पर्व – तिथि सहित
| तिथि | दिन | पर्व / व्रत |
|---|---|---|
| 3 मार्च 2026 | मंगलवार | होलिका दहन |
| 4 मार्च 2026 | बुधवार | होली (धुलेंडी) |
| 6 मार्च 2026 | शुक्रवार | संकष्टी चतुर्थी |
| 15 मार्च 2026 | रविवार | पापमोचनी एकादशी |
| 16 मार्च 2026 | सोमवार | प्रदोष व्रत (कृष्ण पक्ष) |
| 17 मार्च 2026 | मंगलवार | मासिक शिवरात्रि |
| 19 मार्च 2026 | गुरुवार | चैत्र नवरात्रि प्रारंभ |
| 19 मार्च 2026 | गुरुवार | गुड़ी पड़वा / उगादी |
| 19 मार्च 2026 | गुरुवार | चेटी चंद |
| 26 मार्च 2026 | गुरुवार | राम नवमी |
| 29 मार्च 2026 | रविवार | कामदा एकादशी |
| 30 मार्च 2026 | सोमवार | प्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष) |
📌 नोट: तिथियाँ सामान्य भारतीय पंचांग पर आधारित हैं। स्थान के अनुसार एक दिन का अंतर संभव है।
होलिका दहन और होली 2026

मार्च 2026 में होलिका दहन 3 मार्च को और होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। ये दोनों पर्व फाल्गुन पूर्णिमा से जुड़े हुए हैं और हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, जबकि होली सामाजिक प्रेम, भाईचारे और आनंद का पर्व माना जाता है।
होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पर्व यह सिखाता है कि अहंकार, अन्याय और अधर्म चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः उनका नाश निश्चित होता है। प्रह्लाद और होलिका की कथा इसी भाव को स्पष्ट करती है। इस दिन अग्नि में नकारात्मक प्रवृत्तियों के त्याग का संकल्प लिया जाता है, इसलिए इसे आत्मशुद्धि से भी जोड़ा जाता है।
होलिका दहन के अगले दिन होली मनाई जाती है, जिसे रंगों का त्योहार कहा जाता है। होली केवल रंग खेलने का पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता और मेल-मिलाप का प्रतीक है। इस दिन लोग पुराने मतभेद भूलकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और गले मिलते हैं। ग्रामीण और शहरी — दोनों क्षेत्रों में होली सामूहिक उल्लास का अवसर प्रदान करती है।
धार्मिक रूप से होली का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से भी जुड़ा माना जाता है, विशेषकर ब्रज क्षेत्र में। वहाँ होली भक्ति, संगीत और परंपरा का जीवंत रूप बन जाती है। मार्च माह में होली का आगमन यह संकेत देता है कि शीत ऋतु समाप्त हो रही है और जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का प्रवेश हो रहा है।
इस प्रकार होलिका दहन और होली दोनों मिलकर यह संदेश देते हैं कि जीवन में समय-समय पर नकारात्मकता का त्याग और आपसी प्रेम को अपनाना आवश्यक है। यही कारण है कि ये पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
संकष्टी चतुर्थी 2026 – तिथि, व्रत विधि, महत्व और धार्मिक मान्यता
मार्च 2026 में संकष्टी चतुर्थी 6 मार्च, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह व्रत हिन्दू पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को आता है और भगवान गणेश को समर्पित होता है। संकष्टी शब्द का अर्थ ही होता है कष्टों से मुक्ति, इसलिए इस व्रत को जीवन की बाधाओं, मानसिक तनाव और कार्यों में आ रही रुकावटों को दूर करने वाला माना गया है। गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा गया है, अर्थात् वे भक्तों के जीवन से विघ्नों का नाश करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी माना गया है जो किसी कार्य में लंबे समय से अटके हुए हों या मानसिक असमंजस से गुजर रहे हों। मार्च का महीना जहाँ ऋतु परिवर्तन और नए आरंभ की तैयारी का समय होता है, वहीं इस माह की संकष्टी चतुर्थी आने वाले कार्यों के लिए शुभ संकल्प लेने का अवसर प्रदान करती है। गणेश उपासना से विवेक, धैर्य और सही निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त होने की मान्यता है।
संकष्टी चतुर्थी की व्रत विधि अन्य व्रतों से थोड़ी भिन्न मानी जाती है। इस दिन प्रातःकाल स्नान कर भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है और दिनभर उपवास रखा जाता है। श्रद्धालु सात्त्विक आचरण का पालन करते हैं और अनावश्यक विवाद या नकारात्मक विचारों से दूर रहते हैं। परंपरा के अनुसार रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद ही गणेश पूजा कर व्रत का पारण किया जाता है। पूजा में गणेश जी को दूर्वा, पुष्प और दीप अर्पित किए जाते हैं तथा गणेश मंत्रों का जप किया जाता है।
चंद्रमा को मन का कारक माना गया है, जबकि भगवान गणेश बुद्धि और विवेक के देवता हैं। संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन के बाद गणेश पूजा करने से मन और बुद्धि में संतुलन स्थापित होने की मान्यता है। यही कारण है कि यह व्रत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानसिक शांति और आत्मनियंत्रण से भी जुड़ा माना जाता है। कई परिवारों में इस दिन सामूहिक रूप से पूजा की जाती है, जिससे घर का वातावरण सकारात्मक और शांत रहता है।
धार्मिक विश्वास के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का नियमित पालन करने से जीवन की बाधाएँ धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। यह व्रत व्यक्ति को संयम, धैर्य और निरंतर प्रयास का महत्व समझाता है। मार्च 2026 की संकष्टी चतुर्थी इस दृष्टि से विशेष है कि यह आने वाले महीनों के लिए स्थिरता और शुभता का आधार तैयार करने वाला पर्व मानी जाती है।
एकादशी व्रत 2026 (पापमोचनी एकादशी और कामदा एकादशी) – तिथि, व्रत विधि, महत्व और धार्मिक विश्वास
मार्च 2026 में हिन्दू पंचांग के अनुसार दो महत्वपूर्ण एकादशी व्रत आते हैं— पापमोचनी एकादशी (15 मार्च 2026, रविवार) और कामदा एकादशी (29 मार्च 2026, रविवार)। एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और इसे आत्मशुद्धि, संयम तथा धार्मिक उन्नति का प्रमुख साधन कहा गया है। मार्च का महीना फाल्गुन मास के समापन और चैत्र मास के आरंभ से जुड़ा होता है, इसलिए इस समय आने वाली एकादशियाँ विशेष आध्यात्मिक महत्व रखती हैं।
पापमोचनी एकादशी का नाम ही इसके महत्व को स्पष्ट करता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह व्रत व्यक्ति को अपने किए गए पापों और गलतियों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। होली जैसे उत्सवों के बाद आने वाली यह एकादशी यह संदेश देती है कि जीवन में आनंद के साथ-साथ आत्मसंयम और आत्मचिंतन भी आवश्यक है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, जप और ध्यान करने से मन की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त होती है।
इसके बाद चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली कामदा एकादशी को इच्छा पूर्ति की एकादशी कहा गया है। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस एकादशी का व्रत करने से धर्मसम्मत कामनाएँ पूर्ण होती हैं और जीवन में स्थिरता आती है। चैत्र मास को हिन्दू नववर्ष का आरंभ माना जाता है, इसलिए कामदा एकादशी नए संकल्प लेने और सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करती है। इस व्रत को विशेष रूप से पारिवारिक सुख और मानसिक संतुलन से जोड़कर देखा जाता है।
एकादशी व्रत की विधि सामान्यतः सरल और संयम पर आधारित होती है। व्रती प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं और दिनभर उपवास रखते हैं। इस दिन अन्न त्याग करने की परंपरा है और फलाहार या सात्त्विक आहार लिया जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि को व्रत का पारण किया जाता है। पूजा में तुलसी पत्र, दीप और विष्णु मंत्रों का विशेष महत्व बताया गया है। कई स्थानों पर इस दिन विष्णु कथा सुनने और सुनाने की परंपरा भी प्रचलित है।
धार्मिक और व्यवहारिक दोनों दृष्टियों से एकादशी व्रत व्यक्ति को अनुशासन, आत्मनियंत्रण और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। नियमित रूप से एकादशी व्रत रखने से न केवल आध्यात्मिक लाभ की मान्यता है, बल्कि यह व्यक्ति को अपने विचारों और आदतों पर नियंत्रण करना भी सिखाता है। मार्च 2026 की पापमोचनी और कामदा एकादशी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं कि ये जीवन में शुद्धता, स्थिरता और सकारात्मक सोच को मजबूत करने वाले व्रत माने जाते हैं।
शिव व्रत 2026 (प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि) – तिथि, महत्व और पूजा परंपरा
मार्च 2026 में भगवान शिव से जुड़े तीन महत्वपूर्ण व्रत आते हैं— प्रदोष व्रत (16 मार्च 2026, सोमवार), मासिक शिवरात्रि (17 मार्च 2026, मंगलवार) और प्रदोष व्रत (30 मार्च 2026, सोमवार)। हिन्दू पंचांग में शिव व्रतों का विशेष स्थान माना गया है, क्योंकि भगवान शिव को संहारक होने के साथ-साथ करुणा, तप और संतुलन का प्रतीक भी माना जाता है। मार्च का महीना जहाँ ऋतु परिवर्तन और नए आरंभ का समय होता है, वहीं इस माह के शिव व्रत जीवन में स्थिरता और मानसिक शांति प्रदान करने वाले माने जाते हैं।
प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि की संध्या को किया जाता है और इसे शिव उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रदोष काल में की गई शिव पूजा विशेष फलदायी होती है। मार्च 2026 में कृष्ण पक्ष का प्रदोष 16 मार्च को और शुक्ल पक्ष का प्रदोष 30 मार्च को पड़ता है। सोमवार का प्रदोष होने के कारण इसे विशेष महत्व प्राप्त होता है, क्योंकि सोमवार स्वयं भगवान शिव को समर्पित माना गया है। इस दिन शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित कर दीप प्रज्वलन करने की परंपरा है।
मासिक शिवरात्रि 17 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। यह व्रत प्रत्येक माह आता है और इसे भगवान शिव की विशेष रात्रि कहा जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार इस दिन रात्रि जागरण, मंत्र जप और शिव पूजा करने से व्यक्ति को मानसिक शांति और आत्मबल प्राप्त होता है। मासिक शिवरात्रि महाशिवरात्रि की तरह ही शिव भक्ति का अवसर प्रदान करती है, हालांकि इसका स्वरूप सरल और संयमित माना गया है। इस दिन शिव पुराण या शिव कथा सुनने-सुनाने की भी परंपरा प्रचलित है।
शिव व्रतों की पूजा विधि सरल और सात्त्विक मानी जाती है। व्रती प्रातः स्नान कर शिव का ध्यान करते हैं और दिनभर संयम रखते हैं। प्रदोष व्रत में संध्या समय शिव पूजा का विशेष महत्व होता है, जबकि शिवरात्रि में रात्रि पूजा को प्रधान माना गया है। शिव उपासना में बेलपत्र, भस्म, जल और दीप का विशेष स्थान बताया गया है। इन व्रतों में कठोर नियमों से अधिक भाव और श्रद्धा को महत्व दिया गया है।
धार्मिक और व्यवहारिक दृष्टि से शिव व्रत व्यक्ति को धैर्य, वैराग्य और संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। मार्च 2026 के ये शिव व्रत मानसिक तनाव को कम करने, नकारात्मक विचारों से मुक्ति पाने और जीवन में स्थिरता लाने वाले माने जाते हैं। इसी कारण ये व्रत न केवल धार्मिक, बल्कि आत्मिक शांति के साधन भी कहे जाते हैं।
चैत्र नवरात्रि और हिन्दू नववर्ष 2026 – तिथि, धार्मिक महत्व और परंपरागत मान्यता

मार्च 2026 में चैत्र नवरात्रि 19 मार्च, गुरुवार से प्रारंभ होती है। इसी दिन हिन्दू नववर्ष भी मनाया जाता है, जिसे देश के विभिन्न भागों में गुड़ी पड़वा, उगादी और चेटी चंद जैसे नामों से जाना जाता है। चैत्र नवरात्रि का यह संयोग हिन्दू पंचांग में अत्यंत शुभ माना गया है, क्योंकि यह समय नए संवत्सर की शुरुआत और शक्ति उपासना दोनों से जुड़ा होता है। इस दिन से चैत्र शुक्ल पक्ष आरंभ होता है, जिसे वर्ष का पहला पक्ष माना गया है।
चैत्र नवरात्रि नौ दिनों तक चलने वाला पर्व है, जिसमें मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह नवरात्रि जीवन में नई ऊर्जा, साहस और सकारात्मक सोच का संचार करती है। मार्च का महीना ऋतु परिवर्तन का समय होता है, इसलिए इस नवरात्रि को शरीर और मन की शुद्धि का अवसर भी माना गया है। परंपरागत रूप से इस दिन घटस्थापना की जाती है और घरों में पूजा का शुभारंभ होता है।
इसी तिथि को हिन्दू नववर्ष मनाया जाना विशेष महत्व रखता है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में उगादी, तथा सिंधी समाज में चेटी चंद के रूप में मनाया जाता है। यद्यपि नाम और परंपराएँ अलग-अलग हैं, लेकिन भाव एक ही है— नए वर्ष का स्वागत, नए संकल्प और नई शुरुआत। इस दिन घरों की सफाई, शुभ सजावट और पारंपरिक व्यंजन बनाने की परंपरा भी प्रचलित है।
धार्मिक दृष्टि से चैत्र नवरात्रि और नववर्ष का संबंध जीवन में संतुलन और अनुशासन से जोड़ा गया है। नवरात्रि के दौरान संयम, व्रत और पूजा व्यक्ति को आत्मनियंत्रण सिखाते हैं, जबकि नववर्ष नए लक्ष्य निर्धारित करने की प्रेरणा देता है। इस समय की गई पूजा और साधना को पूरे वर्ष के लिए शुभ माना गया है। कई परिवारों में इस दिन विशेष रूप से कन्या पूजन और दान करने की परंपरा भी देखी जाती है।
आधुनिक समय में भी चैत्र नवरात्रि और हिन्दू नववर्ष का महत्व बना हुआ है। यह पर्व व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि जीवन में समय-समय पर ठहरकर आत्ममूल्यांकन और नए आरंभ करना आवश्यक है। मार्च 2026 में आने वाली चैत्र नवरात्रि और नववर्ष इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये आध्यात्मिक शक्ति और सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देने वाले पर्व माने जाते हैं।
राम नवमी 2026 – तिथि, धार्मिक महत्व, पूजा परंपरा और जीवन संदेश
मार्च 2026 में राम नवमी 26 मार्च, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आता है और भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। राम नवमी हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र और आदर्शवादी पर्वों में से एक मानी जाती है, क्योंकि भगवान श्रीराम को मर्यादा, सत्य, करुणा और धर्म का प्रतीक माना गया है। चैत्र नवरात्रि के दौरान आने के कारण इस तिथि का आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के घर हुआ था। राम नवमी का पर्व केवल जन्मोत्सव नहीं है, बल्कि यह राम के आदर्श जीवन मूल्यों को स्मरण करने का अवसर भी है। श्रीराम को आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श राजा माना गया है। इस दिन रामायण पाठ, भजन-कीर्तन और भगवान राम के नाम का स्मरण विशेष रूप से किया जाता है।
राम नवमी की पूजा परंपरा सरल और श्रद्धा पर आधारित मानी जाती है। भक्त प्रातः स्नान कर भगवान राम की मूर्ति या चित्र की पूजा करते हैं। पूजा में पुष्प, दीप, धूप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। कई स्थानों पर इस दिन उपवास रखने की परंपरा भी है, जिसे शुद्धता और संयम से जोड़ा गया है। मंदिरों में विशेष सजावट, राम कथा और सामूहिक आरती का आयोजन किया जाता है। अयोध्या सहित अनेक धार्मिक स्थलों पर राम नवमी बड़े उत्साह और भक्ति भाव से मनाई जाती है।
सामाजिक दृष्टि से राम नवमी का संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व समाज को सत्य, न्याय और मर्यादा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भगवान राम का जीवन यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धर्म और नैतिकता का पालन करना ही सच्ची विजय है। पारिवारिक और सामाजिक जीवन में राम के आदर्शों को अपनाने से आपसी सम्मान और सद्भाव बना रहता है।
आधुनिक समय में भी राम नवमी का महत्व कम नहीं हुआ है। यह पर्व व्यक्ति को यह याद दिलाता है कि भौतिक प्रगति के साथ-साथ नैतिक मूल्यों और आत्मसंयम का होना भी आवश्यक है। मार्च 2026 में आने वाली राम नवमी इस दृष्टि से विशेष है कि यह नवरात्रि के पावन वातावरण में धर्म, भक्ति और आदर्श जीवन का संदेश देती है।
मार्च 2026 के व्रत-त्योहारों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी
मार्च 2026 के हिन्दू व्रत-त्योहारों को लेकर लोगों के मन में कई सामान्य प्रश्न रहते हैं। सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न यही होता है कि मार्च 2026 में सबसे बड़ा पर्व कौन-सा है। धार्मिक दृष्टि से देखें तो इस महीने होलिका दहन, होली, चैत्र नवरात्रि और राम नवमी को प्रमुख पर्व माना जाता है, जबकि व्रतों में संकष्टी चतुर्थी, एकादशी और शिव व्रत विशेष महत्व रखते हैं। यह महीना इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें उत्सव और व्रत दोनों का संतुलन देखने को मिलता है।
एक अन्य सामान्य प्रश्न यह होता है कि मार्च 2026 में नवरात्रि कब शुरू होगी। हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि 19 मार्च 2026 से प्रारंभ होती है और इसी दिन हिन्दू नववर्ष भी मनाया जाता है। इसी तिथि को गुड़ी पड़वा, उगादी और चेटी चंद जैसे पर्व देश के अलग-अलग क्षेत्रों में मनाए जाते हैं। यह संयोग वर्ष में बहुत कम देखने को मिलता है, इसलिए इसका विशेष धार्मिक महत्व माना गया है।
कई श्रद्धालु यह भी पूछते हैं कि मार्च 2026 में कितनी एकादशी हैं। इस महीने दो एकादशी व्रत पड़ते हैं— पापमोचनी एकादशी और कामदा एकादशी। दोनों ही व्रत भगवान विष्णु को समर्पित हैं और इन्हें संयम, आत्मशुद्धि और सकारात्मक जीवन के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। इसी तरह संकष्टी चतुर्थी को लेकर भी प्रश्न रहता है कि क्या यह व्रत सभी लोग कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत श्रद्धा और क्षमता के अनुसार किया जाना चाहिए और स्वास्थ्य का ध्यान रखना आवश्यक है।
मार्च 2026 के शिव व्रतों को लेकर भी लोगों में उत्सुकता रहती है। इस महीने प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि दोनों आते हैं, जिन्हें मानसिक शांति और आत्मबल से जोड़ा गया है। वहीं राम नवमी को लेकर यह प्रश्न आम है कि क्या इस दिन व्रत आवश्यक है। शास्त्रों के अनुसार व्रत आस्था पर निर्भर होता है, मुख्य उद्देश्य भगवान राम के आदर्शों को स्मरण करना है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि मार्च 2026 के व्रत-त्योहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये व्यक्ति को संयम, संतुलन और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा देते हैं। यह महीना पुराने समय को पीछे छोड़कर नए संकल्पों के साथ आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है।
पंचांग चेतावनी: यहाँ दी गई तिथियाँ सामान्य भारतीय पंचांग पर आधारित हैं। चंद्र तिथि और स्थानीय गणना के कारण कुछ स्थानों पर एक दिन का अंतर संभव है। किसी भी व्रत या अनुष्ठान से पूर्व अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग या विद्वान से पुष्टि करना उचित माना जाता है।
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❓मार्च 2026 के व्रत-त्योहार (FAQ’s)
प्रश्न: मार्च 2026 में कौन-कौन से प्रमुख हिन्दू व्रत-त्योहार हैं?
उत्तर: मार्च 2026 में होलिका दहन, होली, संकष्टी चतुर्थी, पापमोचनी एकादशी, कामदा एकादशी, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, गुड़ी पड़वा, उगादी, चेटी चंद और राम नवमी जैसे प्रमुख हिन्दू व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं।
प्रश्न: मार्च 2026 में चैत्र नवरात्रि कब शुरू होगी?
उत्तर: हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि 19 मार्च 2026, गुरुवार से प्रारंभ होगी। इसी दिन हिन्दू नववर्ष भी मनाया जाता है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में गुड़ी पड़वा, उगादी और चेटी चंद कहा जाता है।
प्रश्न: मार्च 2026 में होलिका दहन और होली किस दिन है?
उत्तर: मार्च 2026 में होलिका दहन 3 मार्च, मंगलवार को और होली 4 मार्च, बुधवार को मनाई जाएगी। ये दोनों पर्व फाल्गुन पूर्णिमा से जुड़े होते हैं।
प्रश्न: मार्च 2026 में संकष्टी चतुर्थी कब है?
उत्तर: मार्च 2026 में संकष्टी चतुर्थी 6 मार्च, शुक्रवार को पड़ेगी। यह व्रत कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान गणेश को समर्पित होता है और इसे कष्ट निवारण का व्रत माना जाता है।
प्रश्न: मार्च 2026 में कितनी एकादशी व्रत हैं?
उत्तर: मार्च 2026 में दो एकादशी व्रत पड़ते हैं—
पापमोचनी एकादशी (15 मार्च 2026) और
कामदा एकादशी (29 मार्च 2026)।
दोनों व्रत भगवान विष्णु की उपासना से जुड़े माने जाते हैं।
प्रश्न: क्या मार्च 2026 की तिथियाँ सभी जगह एक-सी रहेंगी?
उत्तर: नहीं, चंद्र तिथि और स्थानीय पंचांग की गणना के कारण कुछ स्थानों पर व्रत-त्योहारों की तिथि में एक दिन का अंतर संभव है। इसलिए किसी भी अनुष्ठान से पहले स्थानीय पंचांग देखना उचित माना जाता है।


