षटतिला एकादशी 2026 वर्ष की पहली एकादशी व्रत है, जो माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। यह 14 जनवरी 2026 (बुधवार) को आएगी और इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करके उपवास रखा जाता है। विशेष रूप से तिल (Sesame) का उपयोग पूजा में किया जाता है, जिससे स्वास्थ्य, समृद्धि और पापों का नाश माना जाता है।

भूमिका (Introduction) – क्या है षटतिला एकादशी?
षटतिला एकादशी 2026 हिंदू धर्म की उन खास एकादशियों में से है, जिनमें तिल को केंद्र में रखकर उपवास, दान और आत्म-शुद्धि की बात की जाती है। माघ महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली यह एकादशी सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हमारे जीवन के तौर-तरीके, मौसम, सेहत और समाज के प्रति दया-भाव से भी गहराई से जुड़ी होती है।
भारतीय परंपरा में व्रत का मतलब केवल भूखा रहना नहीं होता, बल्कि मन, बोल और काम — तीनों पर संयम रखना ही असली व्रत माना जाता है। षटतिला एकादशी 2026 हमें यही सिखाती है कि सच्चा व्रत वही है जिसमें सोच साफ हो, बोल मधुर हों और कर्म सही हों।
कहते हैं इस दिन तिल को छः तरह से इस्तेमाल करने की परंपरा रही है — इसलिए नाम रहा षटतिला। तिल जैसा छोटा सा बीज भी हमारे जीवन में बड़ा असर डाल सकता है — छोटे-छोटे कामों का बड़ा फल होता है। सर्दियों के बीच यह व्रत तन को गर्मी, मन को शान्ति और समाज में बाँटने का संदेश देता है। आज के तेज-भाग दौड़ भरे समय में भी षटतिला एकादशी हमें संयम, संतुलन और दूसरों के लिये संवेदना रखना याद दिलाती है।
यह भी पढ़ें : जनवरी के व्रत और पर्व
Table of Contents
षटतिला एकादशी क्या है?
षटतिला एकादशी हिन्दू धर्म का एक प्रमुख व्रत है जो भगवान विष्णु की उपासना के लिए रखा जाता है। इसका नाम “षटतिला” इसीलिए पड़ा क्योंकि “षट” का अर्थ होता है छह और “तिला” का मतलब होता है तिल (Sesame) — अर्थात इस व्रत और पूजा में तिल के छह प्रकार के प्रयोग का महत्व बताया गया है।
एकादशी तिथि का समय हिन्दू पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष के ग्यारहवें दिन होता है और यह व्रत विशेषकर विष्णु भगवान को समर्पित है। तिल को धन, ऊर्जा, स्वास्थ्य और पुण्य का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस दिन तिल से बने दान, स्नान, भोजन और भोग को शुभ माना जाता है।
षटतिला एकादशी लोग इस विश्वास के साथ रखते हैं कि इससे पापों के नाश, धन-समृद्धि, बुद्धि की प्रप्ति और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
षटतिला एकादशी का शुभ मुहूर्त (2026)
वर्ष 2026 में षटतिला एकादशी 14 जनवरी, बुधवार को मनाई जाएगी।
- एकादशी तिथि आरंभ: 13 जनवरी 2026, दोपहर 3:17 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 14 जनवरी 2026, सायंकाल 5:52 बजे
- पारण का शुभ समय: 15 जनवरी 2026, प्रातः 7:15 से 9:21 बजे
व्रत उसी दिन मनाया जाता है जब एकादशी तिथि अधिकांश दिन रहे। अधिकांश स्थानों पर 14 जनवरी 2026 ही मुख्य दिन माना जाता है और इसी दिन भक्त सारा उपवास और पूजा-विधि करते हैं।
सरल पूजा-विधि (घर पर, स्टेप-बाय-स्टेप)
- तैयारी: एकादशी-पूर्व दिन हल्का भोजन कर लें। अगले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।
- सज्जा: घर के मंदिर में साफ-सफाई करें, दीपक और धूप रखें। विष्णु/नारायण की तस्वीर या प्रतिमा सामने रखें।
- प्रार्थना व जप: “ॐ नमो नारायण” या कोई भी सरल विष्णु-मन्त्र जपें; भजन-कीर्तन कर सकते हैं।
- तिल-दान: तिल, तिल-लड्डू, तिल-कुट्टू, गुड़ आदि दान में दें। गरीब/जरूरतमंद, ब्राह्मण या मंदिर में दान कर सकते हैं।
- पारण (व्रत खोलना): द्वादशी के सुबह-समय/स्थानीय निर्देशानुसार पारण करें — हल्का भोजन लें।
ध्यान: भावना ज्यादा जरूरी है; दिखावे के लिए न करें। यदि शारीरिक कारण से पूरा उपवास न हो सके तो फलाहार/जल-व्रत भी किया जा सकता है।
षटतिला एकादशी में तिल का विशेष महत्व
तिल को भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र माना गया है। षटतिला एकादशी में तिल का छह प्रकार से प्रयोग करने का विधान बताया गया है—
- तिल मिले जल से स्नान
- तिल का उबटन
- तिल से हवन
- तिल का दान
- तिल युक्त भोजन या फलाहार
- तिल से तर्पण
इन सभी क्रियाओं का उद्देश्य शरीर, मन और समाज—तीनों स्तरों पर संतुलन बनाना है। तिल का सेवन शरीर को ऊर्जा देता है, दान सामाजिक करुणा को बढ़ाता है और हवन व स्नान आत्मशुद्धि का प्रतीक बनते हैं।
षटतिला एकादशी की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में एक निर्धन ब्राह्मणी रहती थी, जो अत्यंत श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा करती थी। वह नियमित रूप से व्रत और पूजा तो करती थी, लेकिन दान के महत्व को समझ नहीं पाई थी। उसके जीवन में भक्ति तो थी, पर परोपकार का भाव बहुत सीमित था। समय आने पर जब उसका देहांत हुआ, तो उसे स्वर्ग में वह सुख प्राप्त नहीं हुआ, जिसकी वह अपेक्षा कर रही थी।
कष्ट की अवस्था में उसने भगवान विष्णु का ध्यान किया और अपनी स्थिति का कारण पूछा। तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि केवल पूजा और व्रत पर्याप्त नहीं होते, जब तक उनमें दान और करुणा का भाव न जुड़ा हो। भगवान ने उसे षटतिला एकादशी के महत्व के बारे में बताया और कहा कि इस एकादशी पर तिल का दान और संयमपूर्वक व्रत करने से उसके दोष दूर हो सकते हैं।
भगवान विष्णु की कृपा से ब्राह्मणी को पुनः अवसर मिला। उसने श्रद्धा से षटतिला एकादशी का व्रत किया और तिल का दान किया। इसके फलस्वरूप उसके कष्ट समाप्त हुए और उसे शांति प्राप्त हुई। यह कथा हमें सिखाती है कि भक्ति के साथ दान और करुणा का होना भी उतना ही आवश्यक है।
धार्मिक दृष्टि से षटतिला एकादशी का महत्व
धार्मिक दृष्टि से षटतिला एकादशी को आत्मशुद्धि और पापक्षय का व्रत माना गया है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया व्रत मनुष्य को मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। इस एकादशी पर पूजा, जप और दान को विशेष फलदायी बताया गया है।
धार्मिक परंपरा में तिल को पवित्र माना गया है। इसलिए इस दिन तिल से जुड़े कार्य—जैसे दान, हवन या भोजन—को आत्मशुद्धि से जोड़ा गया। यह विश्वास केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण को भी प्रभावित करता है। व्रत रखने वाला व्यक्ति संयमित भोजन, शांत विचार और विनम्र व्यवहार अपनाने का प्रयास करता है।
षटतिला एकादशी का धार्मिक महत्व इस बात में भी निहित है कि यह मनुष्य को अहंकार से दूर रहने की सीख देती है। दान के माध्यम से व्यक्ति अपने पास मौजूद साधनों को समाज के साथ साझा करता है। इस प्रकार यह व्रत आस्था के साथ-साथ करुणा और सेवा के भाव को भी मजबूत करता है।
वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टि
वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टि से षटतिला एकादशी का संबंध सीधे तौर पर ऋतु परिवर्तन, खान-पान और जीवनशैली के संतुलन से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। यह एकादशी माघ मास में आती है, जब शीत ऋतु अपने चरम पर होती है। इस समय मानव शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा और ऊष्मा की आवश्यकता होती है। तिल को प्राचीन काल से ऐसा खाद्य पदार्थ माना गया है, जो शरीर को गर्मी देता है और ऊर्जा प्रदान करता है। इसी कारण ठंड के मौसम में तिल, गुड़ और उनसे बने पदार्थों का सेवन परंपरागत रूप से बढ़ जाता है।
उपवास की परंपरा भी वैज्ञानिक रूप से उपयोगी मानी जाती है। एकादशी के दिन हल्का भोजन या फलाहार पाचन तंत्र को विश्राम देता है और शरीर में जमा अनावश्यक तत्वों को संतुलित करने में सहायता करता है। इसके साथ ही संयमित आहार मन और शरीर दोनों को अनुशासन में रखने में सहायक होता है।
तार्किक दृष्टि से देखा जाए तो तिल का दान सामाजिक संतुलन से जुड़ा है। ठंड के मौसम में जरूरतमंदों को ऊर्जा देने वाला भोजन उपलब्ध कराना समाज के लिए उपयोगी था। इस प्रकार षटतिला एकादशी केवल धार्मिक आस्था पर आधारित नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, समाज और व्यवहारिक समझ से जुड़ा हुआ पर्व है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
षटतिला एकादशी का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व दान, सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना से जुड़ा हुआ है। यह पर्व व्यक्ति को केवल अपनी भक्ति तक सीमित नहीं रखता, बल्कि समाज के प्रति कर्तव्य का बोध कराता है। इस दिन तिल, अन्न, वस्त्र या धन का दान करने की परंपरा है, जिससे जरूरतमंद लोगों को सहायता मिलती है। विशेष रूप से ठंड के मौसम में तिल जैसे ऊर्जादायक पदार्थ का दान समाज के कमजोर वर्गों के लिए उपयोगी माना जाता है।
सांस्कृतिक दृष्टि से षटतिला एकादशी पारिवारिक और सामाजिक एकता को मजबूत करती है। परिवार के सदस्य मिलकर व्रत और पूजा करते हैं, जिससे आपसी संबंधों में सहयोग और सौहार्द बढ़ता है। सामूहिक पूजा और दान की परंपरा सामाजिक समरसता को बनाए रखने में सहायक होती है। यह एकादशी यह संदेश देती है कि धार्मिक परंपराओं का वास्तविक उद्देश्य समाज में करुणा, संतुलन और साझा जीवन मूल्यों को विकसित करना है।
क्षेत्रीय परंपराएँ
भारत की सांस्कृतिक विविधता षटतिला एकादशी के उत्सव में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस एकादशी को स्थानीय परंपराओं और जीवनशैली के अनुसार मनाया जाता है। उत्तर भारत में इस दिन तिल और गुड़ से बने पदार्थों का दान और सेवन प्रमुख माना जाता है। कई स्थानों पर लोग नदी या तालाब में स्नान कर तिल का दान करते हैं।
पूर्वी भारत में षटतिला एकादशी के अवसर पर तिल से बने व्यंजन तैयार किए जाते हैं और परिवार के साथ पूजा की जाती है। वहीं कुछ क्षेत्रों में साधु-संतों और जरूरतमंदों को तिल, अन्न और वस्त्र का दान करने की परंपरा प्रचलित है।
दक्षिण भारत में एकादशी का पालन अधिक संयम और नियम के साथ किया जाता है, जहां उपवास और विष्णु भक्ति को विशेष महत्व दिया जाता है। इन क्षेत्रीय परंपराओं के बावजूद, सभी स्थानों पर षटतिला एकादशी का मूल भाव—दान, संयम और शुद्ध आचरण—एक समान रहता है।
आधुनिक समय में प्रासंगिकता
आधुनिक समय में षटतिला एकादशी की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि आज का जीवन तेज़ गति, उपभोग और मानसिक तनाव से भरा हुआ है। यह एकादशी व्यक्ति को ठहरने, सोचने और आत्मसंयम अपनाने का अवसर देती है। उपवास और संयम के माध्यम से मनुष्य अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखता है, जो संतुलित जीवन के लिए आवश्यक है।
दान की भावना आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी प्राचीन काल में थी। षटतिला एकादशी हमें यह याद दिलाती है कि समाज में असमानता और जरूरतमंदों की सहायता के लिए करुणा और साझा प्रयास आवश्यक हैं। आधुनिक संदर्भ में दान केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं, बल्कि समय, सेवा और सहयोग के रूप में भी हो सकता है।
इसके अतिरिक्त, तिल जैसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों का महत्व आज के स्वास्थ्य-चेतन समाज में भी प्रासंगिक है। इस प्रकार षटतिला एकादशी आधुनिक जीवन में संतुलन, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का संदेश देती है।
जीवन के लिए संदेश
षटतिला एकादशी जीवन के लिए संयम, संतुलन और करुणा का स्पष्ट संदेश देती है। यह पर्व सिखाता है कि सच्ची समृद्धि केवल भोग और संग्रह में नहीं, बल्कि साझा करने और संतोष में निहित होती है। उपवास के माध्यम से व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सीखता है, जिससे मन और विचारों में स्थिरता आती है।
तिल जैसे छोटे बीज के माध्यम से यह एकादशी यह समझाती है कि जीवन में छोटी-छोटी अच्छी आदतें भी बड़े सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं। दान का भाव यह सिखाता है कि समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक मानवता से जुड़ी है।
आज के समय में, जब तनाव और असंतुलन आम हो गया है, षटतिला एकादशी का संदेश और भी सार्थक हो जाता है। यह हमें सरल जीवन, संयमित आहार और करुणामय व्यवहार अपनाने की प्रेरणा देती है, जिससे जीवन अधिक शांत, संतुलित और अर्थपूर्ण बन सकता है।
❓ FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न) – षटतिला एकादशी 2026
प्रश्न 1: वर्ष 2026 में षटतिला एकादशी किस दिन मनाई जाएगी?
उत्तर: वर्ष 2026 में षटतिला एकादशी 14 जनवरी, बुधवार को मनाई जाएगी। यह माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है।
प्रश्न 2: 2026 में षटतिला एकादशी की तिथि और समय क्या है?
उत्तर: पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 13 जनवरी 2026 को दोपहर 3:17 बजे प्रारंभ होकर 14 जनवरी 2026 को सायंकाल 5:52 बजे तक रहेगी।
प्रश्न 3: षटतिला एकादशी 2026 में पारण का शुभ समय क्या है?
उत्तर: व्रत का पारण 15 जनवरी 2026 को प्रातः 7:15 बजे से 9:21 बजे के बीच करना शुभ माना गया है।
प्रश्न 4: षटतिला एकादशी 2026 में क्या-क्या दान करना श्रेष्ठ माना जाता है?
उत्तर: इस दिन तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र और धन का दान विशेष पुण्यदायी माना गया है। सामर्थ्य के अनुसार दान करना उचित रहता है।
प्रश्न 5: यदि 2026 में पूरे दिन उपवास संभव न हो तो क्या विकल्प है?
उत्तर: यदि निर्जल व्रत संभव न हो, तो फलाहार या जलाहार किया जा सकता है। साथ ही भगवान विष्णु का स्मरण और तिल का दान अवश्य करना चाहिए।
प्रश्न 6: षटतिला एकादशी 2026 का मुख्य धार्मिक संदेश क्या है?
उत्तर: वर्ष 2026 की षटतिला एकादशी भी हमें संयम, दान, करुणा और संतोष का संदेश देती है, जिससे जीवन में संतुलन और शांति बनी रहती है।
निष्कर्ष
षटतिला एकादशी केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का सार प्रस्तुत करने वाला पर्व है। यह एकादशी तिल जैसे साधारण बीज के माध्यम से संयम, दान और आत्मशुद्धि के गहरे अर्थ को समझाती है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इसके पीछे स्वास्थ्य, सामाजिक संतुलन और व्यवहारिक सोच भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
यह पर्व हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसमें करुणा, सेवा और साझा करने का भाव भी होना चाहिए। व्रत और दान के माध्यम से व्यक्ति न केवल अपने जीवन को संतुलित करता है, बल्कि समाज के प्रति अपने दायित्व को भी निभाता है।
आधुनिक समय में, जब जीवन में तनाव और असंतुलन बढ़ रहा है, षटतिला एकादशी की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। यदि इसके मूल संदेश—संयम, संतोष और करुणा—को जीवनशैली में अपनाया जाए, तो यह पर्व आत्मिक शांति और सामाजिक सौहार्द का सशक्त माध्यम बन सकता है।


