(January Hindu Festivals & Vrat – Complete Guide in Hindi)

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प्रस्तावना — जनवरी का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
जनवरी का महीना ठंड के बीच आता है, फिर भी हिन्दू जीवन में इसे खुशी, भक्ति और परंपराओं का समय माना जाता है। हिन्दू पंचांग के हिसाब से यह समय पौष से माघ में जाने का होता है, जिसे बहुत शुभ माना गया है। इस दौरान मौसम बदलता है, फसल का काम आगे बढ़ता है और लोग पूजा-पाठ, दान और अच्छे कामों में ज़्यादा ध्यान देते हैं।
उत्तर भारत में जनवरी का नाम आते ही मकर संक्रांति, माघ मेला और मौनी अमावस्या जैसे बड़े पर्व याद आते हैं। इन दिनों लोग स्नान-दान करते हैं और तीर्थ स्थानों पर जाते हैं। दक्षिण भारत में इसी समय पोंगल का चार दिन का त्योहार मनाया जाता है, जिसमें नई फसल का स्वागत किया जाता है, सूर्य भगवान की पूजा होती है और प्रकृति को धन्यवाद दिया जाता है। पूर्वोत्तर भारत में माघ बिहू और पश्चिम भारत में उत्तरायण या पतंग उत्सव इस महीने को और रंगीन बना देते हैं।
धर्म की मान्यता है कि जब सूर्य की चाल और चंद्रमा की तिथियाँ एक खास मेल बनाती हैं, तब किया गया काम ज़्यादा फल देता है। इसी वजह से जनवरी का महीना स्नान, दान, व्रत और आत्म-सुधार के लिए अच्छा माना जाता है। यह लेख जनवरी में आने वाले सभी बड़े व्रतों और त्योहारों के बारे में आसान भाषा में जानकारी देता है, ताकि लोग इन परंपराओं को समझकर सही तरीके से अपना सकें और अपने जीवन में अच्छे बदलाव ला सकें।
जनवरी का मास-कैलेंडर — प्रमुख व्रत-त्योहार
नीचे जनवरी 2026 में आने वाले सभी प्रमुख हिंदू व्रत और त्योहारों की सरल, पारंपरिक और समझने योग्य सूची दी गई है। तिथियाँ प्रचलित Hindu Panchang पर आधारित हैं। स्थान के अनुसार समय या तिथि में हल्का अंतर हो सकता है, इसलिए विशेष पूजा से पहले local panchang देखना उचित रहता है।
- पौष पूर्णिमा (Pausha Purnima) — 3 जनवरी 2026
- सकट चौथ (Sakat Chauth) — 6 जनवरी 2026
- षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) — 14 जनवरी 2026
- मौनी अमावस्या (Mauni Amavasya) — 18 जनवरी 2026
- मकर संक्रांति / उत्तरायण (Makar Sankranti / Uttarayan) — 14 जनवरी 2026
- पोंगल (Pongal) — 14–17 जनवरी 2026 (क्षेत्रीय)
- लोहड़ी (Lohri) — 13 जनवरी 2026 (उत्तरी परम्परा)
- माघ अमावस्या / दर्षा अमावस्या — 18 जनवरी 2026 (निर्भर)
- वसंत पंचमी / सरस्वती पूजा (Vasant Panchami / Saraswati Puja) — 23 जनवरी 2026
- रथ सप्तमी (Ratha Saptami / Bhanu Saptami) — 25 जनवरी 2026
- भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) — 26 जनवरी 2026
- जया एकादशी (Jaya Ekadashi) — 29 जनवरी 2026
- गणेश जयंती / गौरी गणेश चतुर्थी (स्थानीय) — 22 जनवरी 2026 (कुछ परम्पराओं में)
अन्य नियमित व्रत (Other Regular Vrats in January)
जनवरी महीने में इन प्रमुख त्योहारों के अलावा कुछ नियमित मासिक और साप्ताहिक व्रत भी आते हैं, जैसे:
- प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat)
- मासिक शिवरात्रि (Monthly Shivratri)
- शुक्ल/कृष्ण पक्ष की एकादशी
- अमावस्या और पूर्णिमा व्रत
ये व्रत स्थानीय परंपरा और पंचांग के अनुसार मनाए जाते हैं।
पौष पूर्णिमा (Pausha Purnima) — अर्थ और विधि
पौष पूर्णिमा पौष महीने की पूर्णिमा को आती है। इस दिन को लोग बहुत पवित्र मानते हैं। कई जगहों पर इसे स्नान-दान का खास दिन माना जाता है। कुछ लोग इस दिन तीर्थ स्थानों पर जाकर स्नान करते हैं और कुछ परंपराओं में पितरों के लिए तर्पण भी किया जाता है। साधु-संतों और धार्मिक लोगों के लिए भी यह दिन काफी महत्वपूर्ण होता है। माना जाता है कि पूर्णिमा के दिन चाँद पूरा होता है, इसलिए यह दिन जीवन में संतुलन और शांति का प्रतीक है।
पूजा कैसे करें (सरल तरीका):
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। घर के मंदिर या किसी साफ जगह पर दीपक जलाएँ और अगरबत्ती लगाएँ। इसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, कपड़े या पैसे का दान करें। अगर संभव हो तो किसी जरूरतमंद को खाना खिलाएँ। इस दिन दिल से किया गया छोटा सा दान भी बहुत फल देता है।
सेहत और मन के लिए महत्व:
लोक मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन मन थोड़ा शांत रहता है और ध्यान लगाने में आसानी होती है। भले ही विज्ञान इसे पूरी तरह साबित न करे, लेकिन सच यह है कि इस दिन लोग शांति से बैठकर सोचते हैं, जिससे मन हल्का और संतुलित महसूस करता है।
2026 में कब है:
पौष पूर्णिमा 3 जनवरी 2026 को पड़ेगी। इस दिन अपने आसपास के पंचांग के अनुसार स्नान-दान और पूजा करना अच्छा माना जाता है।
सकट चौथ (Sakat Chauth) — कथा, साधना और महत्व
सकट चौथ का व्रत ज़्यादातर माएँ अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। यह व्रत माघ महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आता है। कई जगह इसे संकष्टी चतुर्थी या शाकट चौथ भी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि गणेश जी को संकट हरने वाला देवता कहा जाता है।
पुरानी कथाओं के अनुसार, इस व्रत को करने से संतान से जुड़े कष्ट, बीमारी और डर दूर होते हैं। इसलिए माताएँ पूरे मन से यह व्रत रखती हैं और भगवान गणेश से अपने बच्चों की रक्षा की प्रार्थना करती हैं।
व्रत और पूजा कैसे करें (सरल तरीका):
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और मन में व्रत का संकल्प लें। दिन भर बिना अन्न के व्रत रखा जाता है। शाम के समय भगवान गणेश की पूजा की जाती है। पूजा में दूर्वा, गुड़, तिल, मोदक या लड्डू चढ़ाए जाते हैं। इस दिन पूजा के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है और चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है। यही सकट चौथ की सबसे ज़रूरी बात मानी जाती है।
अलग-अलग जगहों की परंपरा:
उत्तर भारत, राजस्थान और मध्य भारत में यह व्रत खास तौर पर मनाया जाता है। कई जगह महिलाएँ एक साथ बैठकर गणेश जी की कथा सुनती हैं और फिर चंद्र दर्शन करती हैं। कुछ घरों में जरूरतमंदों को भोजन या दान भी दिया जाता है।
2026 में कब है:
सकट चौथ 6 जनवरी 2026 को पड़ेगी। इस दिन चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोलने की परंपरा होती है।
पुत्रदा/पौष पुत्रदा एकादशी (Putrada Ekadashi)
पुत्रदा एकादशी एकादशी व्रतों में बहुत खास मानी जाती है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इसे पुत्रदा इसलिए कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा से करने पर संतान-सुख मिलता है और घर में खुशहाली आती है। पुरानी कथाओं में बताया गया है कि सच्चे मन से की गई एकादशी पूजा से भगवान नारायण प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।
व्रत कैसे रखें (सरल तरीका):
एकादशी से एक दिन पहले हल्का और सादा खाना खा लें। एकादशी के दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें। दिन भर बिना अन्न के रहें और मन शांत रखें। शाम को या रात में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें। घर में भजन-कीर्तन करें, “ॐ नमो नारायण” का जप करें। अपनी क्षमता के अनुसार अन्न-दान, ब्राह्मण-भोजन या गाय को चारा देना अच्छा माना जाता है। अगले दिन द्वादशी को सादा भोजन करके व्रत खोलें।
सेहत से जुड़ी बात:
लोक मान्यता और योगिक सोच के अनुसार एकादशी का उपवास पाचन तंत्र को आराम देता है और मन में अनुशासन लाता है। अगर कोई व्यक्ति स्वस्थ है तो हल्का उपवास शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है। बीमारी, गर्भावस्था या कमजोरी में व्रत अपने सामर्थ्य के अनुसार ही रखें।
2026 में कब है:
पौष पुत्रदा एकादशी 10 जनवरी 2026 को पड़ेगी। कुछ जगहों पर तिथि का मान अगले दिन तक भी माना जा सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखकर व्रत और पारण करना ठीक रहता है।
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) — कथा, विधि और सामाजिक संदेश
षटतिला एकादशी का नाम ही तिल से जुड़ा हुआ है। षट मतलब छह और तिला यानी तिल। मान्यता है कि इस दिन तिल का दान और उपयोग छह तरीकों से करने से बहुत पुण्य मिलता है। पुरानी कथाओं में बताया गया है कि तिल का दान करने से पितरों की शांति होती है और घर के पुराने दोष या परेशानियाँ कम होती हैं। इसलिए यह एकादशी खास तौर पर पितृ-शांति और परिवार की भलाई के लिए मानी जाती है।
व्रत और पूजा कैसे करें (सरल तरीका):
इस दिन लोग सुबह स्नान करके व्रत रखते हैं और मन को शांत रखते हैं। पूजा में तिल, गुड़ और तिल से बनी चीज़ें जैसे तिल-लड्डू चढ़ाए जाते हैं। अपनी हैसियत के अनुसार तिल-गुड़ का दान करना बहुत अच्छा माना जाता है। गरीबों या जरूरतमंदों को खाना खिलाना भी पुण्य देता है। कुछ लोग इस दिन पाठ करते हैं, कुछ लोग गाय को चारा देते हैं या छोटा-सा हवन भी करते हैं। असली बात यह है कि व्रत सच्चे मन और अच्छे भाव से किया जाए।
समाज और परिवार के लिए संदेश:
षटतिला एकादशी हमें यह सिखाती है कि अपने पूर्वजों को याद करना, परिवार की इज्जत बनाए रखना और दूसरों की मदद करना कितना जरूरी है। यह व्रत दान की भावना, बड़ों के सम्मान और समाज के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देता है।
2026 में कब है:
षटतिला एकादशी 14 जनवरी 2026 को पड़ेगी। यह मकर संक्रांति के आसपास ही आती है, इसलिए कई जगह लोग एक साथ पूजा, दान और आयोजन करते हैं। सही समय जानने के लिए अपने स्थानीय पंचांग को देखना बेहतर रहता है।
मकर संक्रांति / उत्तरायण / पोंगल / लोहड़ी
जनवरी महीने में जो पर्व सबसे ज़्यादा धूमधाम से मनाया जाता है, वह है मकर संक्रांति। इस दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी वजह से इसे उत्तरायण की शुरुआत माना जाता है। मान्यता है कि उत्तरायण का समय बहुत शुभ होता है, इसलिए इस दिन किया गया स्नान, दान और पूजा ज़्यादा फल देने वाला माना जाता है। भारत के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग नाम और तरीकों से मनाया जाता है।
गुजरात में इसे उत्तरायण कहते हैं और इस दिन बड़े पैमाने पर पतंग उत्सव होता है। घरों की छतें रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाती हैं।
तमिलनाडु में यही पर्व पोंगल के नाम से चार दिन तक मनाया जाता है। इसमें नए अनाज से पोंगल बनाया जाता है, गाय-बैलों की पूजा होती है और आँगन में सुंदर कोलम बनाए जाते हैं।
पंजाब में मकर संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है। लोग आग जलाकर उसके चारों ओर घूमते हैं, लोकगीत गाते हैं और नई फसल के लिए धन्यवाद देते हैं।
असम में इसे माघ बिहू कहा जाता है, जहाँ गाँवों में सामूहिक भोज और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
पूजा और परंपराएँ (सरल शब्दों में):
सुबह स्नान करके सूर्य देव को जल या दूध से अर्घ्य दिया जाता है। यह इस पर्व का सबसे ज़रूरी काम माना जाता है।
इस दिन तिल-गुड़ खाना और बाँटना बहुत आम है। तिल सर्दी में शरीर को गर्म रखता है और गुड़ ताकत देता है। साथ ही इसका संदेश होता है— “मीठा खाओ, मीठा बोलो।”
दक्षिण भारत में नए अनाज से बना भोग चढ़ाया जाता है और पशुओं की पूजा की जाती है। गुजरात में लोग परिवार और दोस्तों के साथ पतंग उड़ाने का आनंद लेते हैं।
सामाजिक और आर्थिक असर:
मकर संक्रांति का सीधा रिश्ता खेती और किसानों से है। फसल कटने के बाद यह पर्व आता है, इसलिए यह आभार और खुशी का समय होता है। इस दौरान बाज़ारों में तिल-गुड़, मिठाइयाँ और पतंगों की खूब बिक्री होती है, जिससे स्थानीय व्यापार को फायदा होता है।
वैज्ञानिक बात:
उत्तरायण के बाद दिन बड़े होने लगते हैं और धूप तेज़ होती है। इससे शरीर को विटामिन-D मिलता है और सेहत पर अच्छा असर पड़ता है। इसी कारण धूप में बैठना और स्नान करना परंपरा का हिस्सा बना।
2026 में कब है:
मकर संक्रांति 14 जनवरी 2026 को पड़ेगी। जगह के हिसाब से सही समय थोड़ा बदल सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग देखना अच्छा रहता है।
लोहड़ी 13 जनवरी 2026 को और पोंगल 14 से 17 जनवरी 2026 तक दक्षिण भारत में मनाया जाएगा।
मौनी अमावस्या (Mauni Amavasya) — अर्थ, इतिहास व परम्परा
मौनी अमावस्या माघ महीने की अमावस्या को आती है। इस दिन को बहुत पवित्र माना जाता है। खास तौर पर साधु-संत, संन्यासी और तीर्थ जाने वाले लोग इस दिन का विशेष ध्यान रखते हैं। इस दिन लोग मौन (चुप रहकर) रहते हैं और भगवान का स्मरण करते हैं। कुंभ मेला और माघ मेला जैसे बड़े धार्मिक आयोजनों में मौनी अमावस्या का बहुत महत्व होता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा, यमुना या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने जाते हैं।
इस दिन क्या करते हैं (सरल तरीका):
लोग सुबह जल्दी उठकर नदी या घर पर ही स्नान करते हैं। स्नान के बाद भगवान का ध्यान करते हैं और अपने परिवार—माता-पिता, बच्चों—की भलाई के लिए प्रार्थना करते हैं। कई जगह नदी किनारे दान-पुण्य, यज्ञ और धार्मिक पाठ होते हैं। कुछ लोग पूरे दिन मौन रखते हैं, यानी कम से कम बोलते हैं। इसका मतलब है मन को शांत रखना और गलत बातों से बचना।
मौन रखने का मतलब क्या है:
मौन केवल चुप रहना नहीं है। इसका असली मतलब है मन और विचारों को साफ रखना, गुस्से और गलत शब्दों से दूर रहना और अपने कामों में सावधानी रखना। इस दिन लोग अपने भीतर झाँकते हैं और सोचते हैं कि जीवन में क्या सही है और क्या नहीं।
समाज के लिए संदेश:
मौनी अमावस्या हमें सिखाती है कि कम बोलना, सही बोलना और अच्छा करना कितना ज़रूरी है। यह दिन आत्म-चिंतन और शांति का संदेश देता है।
2026 में कब है:
मौनी अमावस्या 18 जनवरी 2026 को पड़ेगी। इस दिन कई तीर्थों पर विशेष स्नान और धार्मिक आयोजन होते हैं।
माघ बिहू (Magh Bihu) — पूर्वोत्तर का विशिष्ट उत्सव
माघ बिहू असम और आसपास के इलाकों का बहुत ही खास फसल का त्योहार है। यह माघ महीने में मनाया जाता है और खेती-किसानी से सीधे जुड़ा हुआ है। जब फसल कट जाती है, तब लोग खुशी मनाते हैं और भगवान का धन्यवाद करते हैं। इस त्योहार में गाँव का पूरा माहौल उत्सव जैसा हो जाता है। लोग मिलकर खाना बनाते हैं, खेल-कूद करते हैं और रात में अलाव जलाकर खुशियाँ मनाते हैं।
कैसे मनाया जाता है (सरल शब्दों में):
माघ बिहू के समय गाँवों में सामूहिक भोज होता है। लोग मिट्टी या बांस के बर्तनों में पारंपरिक पकवान बनाते हैं और एक-दूसरे के साथ बाँटते हैं। ढोल-नगाड़ों के साथ बीहू नृत्य और गीत गाए जाते हैं। बच्चे, बुज़ुर्ग और युवा—सब मिलकर इस पर्व का आनंद लेते हैं। इस मौके पर आसपास से लोग और पर्यटक भी आते हैं, जिससे सांस्कृतिक मेल-जोल बढ़ता है।
इस पर्व का मतलब:
माघ बिहू सिर्फ खाने-पीने या नाच-गाने का त्योहार नहीं है। यह गाँव की एकता, मेहनत की खुशी और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक है। इससे असम की ग्रामीण संस्कृति और परंपराएँ ज़िंदा रहती हैं।
2026 में कब है:
माघ बिहू 15 जनवरी 2026 के आसपास मनाया जाएगा। कुछ जगहों पर तारीख़ में थोड़ा फर्क हो सकता है, इसलिए स्थानीय कैलेंडर देखना ठीक रहता है।
वसंत पंचमी / सरस्वती पूजा (Vasant Panchami / Saraswati Puja) — शिक्षा और कला का पर्व
वसंत पंचमी माघ महीने की शुक्ल पंचमी को आती है। यह दिन माँ सरस्वती की पूजा के लिए जाना जाता है, जिन्हें विद्या, कला और संगीत की देवी माना जाता है। इस दिन स्कूलों, कॉलेजों और घरों में सरस्वती पूजा की जाती है। लोग पीले कपड़े पहनते हैं, पीले फूल चढ़ाते हैं और केसर या हल्दी का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि पीला रंग वसंत ऋतु की पहचान माना जाता है।
इस दिन क्या करते हैं (सरल तरीका):
छोटे बच्चों के लिए इस दिन अक्षरारम्भ किया जाता है, यानी उन्हें पहली बार लिखना सिखाया जाता है। माता-पिता और गुरु बच्चों को किताब, कॉपी और कलम देते हैं और माँ सरस्वती से पढ़ाई में आगे बढ़ने की प्रार्थना करते हैं। जो लोग संगीत, नृत्य, लेखन या कला से जुड़े होते हैं, वे भी अपने वाद्य यंत्रों और किताबों की पूजा करते हैं।
आज के समय में महत्व:
आज के दौर में वसंत पंचमी सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है। यह दिन नई सोच, रचनात्मकता और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। विद्यार्थियों के लिए यह आत्मविश्वास बढ़ाने का मौका होता है और कलाकारों के लिए नई ऊर्जा पाने का दिन।
2026 में कब है:
वसंत पंचमी / सरस्वती पूजा 23 जनवरी 2026 को पड़ेगी। सही पूजा-समय के लिए अपने स्थानीय पंचांग को देखना अच्छा रहता है।
रथ सप्तमी / भानु सप्तमी (Ratha Saptami / Bhanu Saptami) — सूर्य की आराधना
रथ सप्तमी को सूर्य देव की पूजा का खास दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव का रथ आगे बढ़ता है और इससे जीवन में ऊर्जा, रोशनी और नई शुरुआत का संकेत मिलता है। इसलिए लोग सुबह-सुबह उठकर स्नान करते हैं और सूर्य को अर्घ्य देकर उनका धन्यवाद करते हैं। कई जगह इस दिन सूर्य-भक्ति के भजन भी गाए जाते हैं।
कैसे पूजा करते हैं (सरल तरीका):
सुबह स्नान करने के बाद खुले स्थान में या छत पर खड़े होकर तांबे के लोटे से जल या दूध सूर्य की ओर अर्पित किया जाता है। कुछ लोग सूर्य देव की आरती करते हैं या छोटे-छोटे मंत्र पढ़ते हैं। जो लोग व्रत रखते हैं, वे दिन भर संयम रखते हैं और पूजा के बाद सादा भोजन करते हैं।
किसानों के लिए महत्व:
खेती-किसानी से जुड़े लोगों के लिए रथ सप्तमी आशा और भरोसे का दिन होता है। यह समय फसल के बीच का होता है, इसलिए किसान अच्छी पैदावार और मौसम के लिए सूर्य देव से प्रार्थना करते हैं।
2026 में कब है:
रथ सप्तमी 25 जनवरी 2026 को पड़ेगी। इस दिन सुबह सूर्य को अर्घ्य देना विशेष शुभ माना जाता है।
भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) — महाभारत से सम्बद्ध व्रत
भीष्म अष्टमी महाभारत से जुड़ा एक बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। यह दिन भीष्म पितामह की याद में मनाया जाता है। भीष्म पितामह वही महान योद्धा थे, जिन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद बाणों की शय्या पर लेटे हुए भी धर्म और सत्य का साथ नहीं छोड़ा। उनके जीवन को त्याग, कर्तव्य और वचन निभाने का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है।
इस दिन क्या किया जाता है:
भीष्म अष्टमी के दिन लोग पितरों को याद करते हैं। कई लोग इस दिन तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं। घर या मंदिर में बैठकर महाभारत या भगवद् गीता की कथाएँ सुनी जाती हैं। अपनी श्रद्धा के अनुसार लोग दान-पुण्य भी करते हैं। यह दिन बड़ों का सम्मान करने और अपने कर्तव्यों को समझने का अवसर देता है।
इस दिन का संदेश:
भीष्म पितामह का जीवन हमें सिखाता है कि वचन निभाना, रिश्तों की मर्यादा रखना और धर्म के रास्ते पर चलना कितना जरूरी है। इस दिन उन्हें याद करके लोगों में अपने परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव आता है।
2026 में कब है:
भीष्म अष्टमी 26 जनवरी 2026 को पड़ेगी। इस दिन श्रद्धा से पितरों का स्मरण और दान करना शुभ माना जाता है।
जया एकादशी (Jaya Ekadashi) और अन्य मासिक एकादशियाँ
एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की भक्ति से जुड़ा होता है। हर महीने शुक्ल और कृष्ण पक्ष में एक-एक एकादशी आती है। इन व्रतों का मकसद होता है संयम रखना, मन को शांत करना और भगवान को याद करना। जया एकादशी भी इन्हीं में से एक है और इसे कई लोग बहुत फल देने वाला मानते हैं। अलग-अलग जगहों पर जया, विजय, अमृतवर्षिणी जैसी एकादशियाँ भी श्रद्धा से रखी जाती हैं।
व्रत कैसे रखा जाता है (सरल तरीका):
एकादशी से एक दिन पहले रात को हल्का और सादा खाना खा लिया जाता है। एकादशी के दिन सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं। दिन भर बिना अन्न के रहकर भगवान विष्णु का स्मरण किया जाता है। शाम या रात में भजन-कीर्तन, नाम-जप और ध्यान किया जाता है। अगले दिन द्वादशी को व्रत खोला जाता है और अपनी क्षमता के अनुसार दान या दक्षिणा दी जाती है।
सेहत से जुड़ी बात:
संयम से रखा गया एकादशी का व्रत शरीर को पाचन से आराम देता है और मन में अनुशासन लाता है। लेकिन जो लोग बीमार हों, गर्भवती हों या बहुत उम्रदराज हों, वे व्रत अपने स्वास्थ्य के अनुसार ही रखें।
2026 में कब है:
जनवरी 2026 में जया एकादशी 29 जनवरी को पड़ेगी। बाकी मासिक एकादशियों की सही तिथि जानने के लिए स्थानीय पंचांग देखना ठीक रहता है।
मासिक प्रदोष, शिवरात्रि और अन्य मासिक व्रत (क्या, क्यों और कैसे)
जनवरी महीने में भी प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि और कुछ दूसरे नियमित मासिक व्रत आते हैं। ये व्रत हर महीने आते हैं और लोग इन्हें अपनी परंपरा और स्थानीय रीति के अनुसार मानते हैं।
प्रदोष व्रत खास तौर पर भगवान शिव की पूजा से जुड़ा होता है और यह शुक्ल या कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को शाम के समय (प्रदोष काल) में किया जाता है।
मासिक शिवरात्रि भगवान शिव की भक्ति और मन की शुद्धि के लिए मानी जाती है।
क्यों रखते हैं ये व्रत:
लोग मानते हैं कि इन व्रतों से घर में शांति बनी रहती है, मन शांत होता है और बुरे समय से राहत मिलती है। शिव भक्तों के लिए ये दिन भगवान शिव को याद करने और उनसे आशीर्वाद माँगने के खास मौके होते हैं।
कैसे किया जाता है (सरल तरीका):
सुबह उठकर स्नान करते हैं और भगवान शिव का ध्यान करते हैं। घर या मंदिर में जल, दूध या बेलपत्र से शिवलिंग पर अभिषेक किया जाता है। कुछ लोग दिन भर उपवास रखते हैं, कुछ लोग फलाहार करते हैं। शाम के समय शिव की आरती की जाती है। कई जगहों पर कथा, भजन और जागरण भी होते हैं, जिनमें लोग मिलकर भाग लेते हैं।
मंदिर और समाज में महत्व:
स्थानीय मंदिरों में इन मासिक व्रतों पर अच्छी भीड़ रहती है। लोग परिवार और पड़ोसियों के साथ मिलकर पूजा करते हैं, जिससे सामूहिक श्रद्धा और आपसी जुड़ाव बढ़ता है।
2026 में कब पड़ेंगे:
जनवरी 2026 के प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि और अन्य मासिक व्रतों की सही तिथियाँ जानने के लिए स्थानीय पंचांग या भरोसेमंद पंचांग वेबसाइट देखना सबसे अच्छा रहता है।
जनवरी में होने वाले अन्य धार्मिक एवं राष्ट्रिय-दिन (संक्षेप)
जनवरी का महीना सिर्फ धार्मिक व्रत-त्योहारों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और सामाजिक दिन भी आते हैं। ये दिन हमें अपने देश, समाज और युवाओं की भूमिका की याद दिलाते हैं।
12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। यह दिन स्वामी विवेकानन्द जी की जयंती के रूप में जाना जाता है। इस दिन युवाओं को अच्छे विचार, आत्मविश्वास और देश-सेवा की प्रेरणा दी जाती है। स्कूलों और कॉलेजों में भाषण, कार्यक्रम और विचार-गोष्ठियाँ होती हैं।
26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमारे देश के संविधान के लागू होने की याद दिलाता है। पूरे देश में ध्वजारोहण, परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। यह दिन हमें अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की भी याद दिलाता है।
इसके अलावा जनवरी में कुछ क्षेत्रीय स्मृति-दिवस और स्थानीय महत्व के दिन भी मनाए जाते हैं, जो लोक-संस्कृति और समाज की पहचान से जुड़े होते हैं।
कुल मिलाकर, जनवरी का महीना धर्म, समाज और राष्ट्र—तीनों का संतुलन सिखाता है। यह हमें भक्ति के साथ-साथ जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा भी देता है।
जनवरी के व्रत-त्योहारों का सामाजिक, स्वास्थ्य और आर्थिक आयाम
जनवरी के व्रत-त्योहार — समाज, सेहत और रोज़गार पर असर (आसान बोलचाल की भाषा में)
जनवरी में आने वाले व्रत और त्योहारों का असर सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज, सेहत और कमाई-धंधे तीनों पर साफ़ दिखता है। जब लोग मिल-जुलकर पर्व मनाते हैं, तो आपसी मेल-मिलाप बढ़ता है और समाज में अपनापन महसूस होता है। इन दिनों बाज़ारों में भी रौनक रहती है।
मकर संक्रांति के समय पतंग, मांझा, तिल-गुड़ और मिठाइयों की खूब बिक्री होती है। पोंगल के दिनों में अनाज, दूध और मिठाइयों का व्यापार बढ़ता है। माघ मेले में दुकानदारों, नाविकों, कारीगरों और छोटे व्यापारियों को रोज़गार के मौके मिलते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधा फायदा होता है।
सेहत के नज़रिये से देखें तो जनवरी के त्योहार मौसम के हिसाब से बनाए गए लगते हैं। ठंड में तिल और गुड़ खाना शरीर को गर्मी देता है और ताकत भी बढ़ाता है। सुबह स्नान करना और धूप में बैठना शरीर को स्फूर्ति देता है, जिससे विटामिन-D मिलने में मदद मिलती है। हाँ, यह ज़रूरी है कि व्रत अपनी सेहत देखकर रखें। जिन लोगों को पुरानी बीमारी हो, उन्हें डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर रहता है।
मन और समाज पर असर:
त्योहार मिल-जुलकर मनाने से मन हल्का होता है। रिश्तेदारों और पड़ोसियों से मिलना, साथ बैठकर खाना, गीत-संगीत और नाच-गाना — ये सब तनाव कम करते हैं। व्रत-त्योहार हमें दान, मदद और बड़ों के सम्मान का भाव सिखाते हैं। असल में इन परंपराओं का मकसद समाज में एकता, करुणा और आपसी समझ को मजबूत करना है।
निष्कर्ष
जनवरी का महीना भारतीय संस्कृति में धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। इस माह के व्रत और त्योहार हमें संयम, सेवा और संतुलन का मार्ग दिखाते हैं।
यही कारण है कि जनवरी को भारतीय परंपरा में वर्ष का केवल पहला महीना नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और नई शुरुआत का काल माना गया है।
SanskritiSaar.in का उद्देश्य इन्हीं मूल्यों को सरल, प्रमाणिक और जन-उपयोगी भाषा में प्रस्तुत करना है, ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे।
❓ FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Q1. जनवरी में सबसे प्रमुख हिंदू त्योहार कौन-से हैं?
उत्तर: जनवरी में मकर संक्रांति, लोहड़ी, पोंगल, मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी प्रमुख हैं।
Q2. माघ मास का इतना महत्व क्यों है?
उत्तर: माघ मास को स्नान, दान और तप के लिए सबसे पुण्यकारी माना गया है।
Q3. क्या जनवरी में एकादशी व्रत आते हैं?
उत्तर: हाँ, पौष पुत्रदा एकादशी और षटतिला एकादशी जनवरी में आती हैं।
Q4. मौनी अमावस्या पर मौन क्यों रखा जाता है?
उत्तर: मौन आत्मसंयम और मानसिक शुद्धि का माध्यम माना गया है।
Q5. बसंत पंचमी किस देवी को समर्पित है?
उत्तर: बसंत पंचमी मां सरस्वती को समर्पित पर्व है।


