Satyanarayan Vrat Katha: भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की कथा है, जिसे व्रत और पूजा के साथ पढ़ा या सुना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से पूर्णिमा, गुरुवार या किसी शुभ अवसर पर किया जाता है। श्रद्धा से कथा सुनने या पढ़ने मात्र से भी सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

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सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा – पहला अध्याय
एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्री सूतजी महाराज से पूछा – महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं। श्री सूतजी बोले – इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान श्री कमलापतिजी ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूँ, आप लोग सावधान होकर सुनें।
एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए पृथ्वी लोक में आए और यहाँ उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश, दुःख भोगते हुए देखा तथा ‘किस उपाय से इनका दुःख सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक को गए। वहाँ चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वरमाला से विभूषित शुद्ध स्वरूप भगवान श्री नारायणजी का दर्शन कर उन देवाधिदेव की वे स्तुति करने लगे।
नारदजी बोले – हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्त शक्तिसंपन्न, आदि-मध्य-अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणों से संपन्न, भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मन्, आपको नमस्कार है।सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक को गए। वहाँ चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुद्ध स्वरूप भगवान श्री नारायणजी का दर्शन कर उन देवाधिदेव की वे स्तुति करने लगे।
नारदजी बोले – हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्त शक्तिसंपन्न, आदि-मध्य-अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणों से संपन्न, भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मन्, आपको नमस्कार है।स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्री विष्णुजी ने नारदजी से कहा – महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहाँ आए हैं, आपके मन में क्या है?
नारदजी बोले – भगवन्! पृथ्वी लोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के कष्टों से दुःखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मुझ पर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूँ।
श्री भगवान ने कहा – हे नारद! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे मैं आपको बताता हूँ, सुनो। हे नारद! स्वर्ग और पृथ्वी लोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूँ।
अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायणजी का व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भगवान की ऐसी वाणी सुनकर नारदजी ने कहा – प्रभो! इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बताइए।
भगवान ने कहा – यह श्री सत्यनारायणजी का व्रत दुःख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से सम्पन्न होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बंधु-बांधवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान श्री सत्यनारायणजी की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ सवाया मात्रा में भक्ति-पूर्वक अर्पित करने चाहिए।केले के फल, घी, दूध, गेहूँ का चूर्ण अथवा गेहूँ के चूर्ण के अभाव में साठी का चूर्ण, शक्कर या गुड़ — यह सब योग्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए।
बंधु-बांधवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवानजी की कथा सुनकर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भक्ति-पूर्वक प्रसाद ग्रहण कर नृत्य-गीत आदि का आयोजन करे। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर को जाए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में पृथ्वी लोक में यह सबसे छोटा एवं सरल उपाय है।
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा – दूसरा अध्याय
सूतजी ने कहा – हे ऋषियों! जिन्होंने पहले समय में इस व्रत को किया है उनका इतिहास कहता हूँ, आप सब ध्यान से सुनें। सुन्दर काशीपुरी नगरी में एक अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण भूख और प्यास से बेचैन होकर पृथ्वी पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम करने वाले श्री विष्णु भगवानजी ने उस ब्राह्मण को देखकर एक दिन बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण किया और ब्राह्मण के पास जाकर आदर के साथ पूछा—हे विप्रदेव! तुम निश्चय ही दुःखी होकर पृथ्वी पर क्यों घूमते रहते हो?
तब उस ब्राह्मण ने कहा—मैं भिक्षा के लिए पृथ्वी पर फिरता हूँ। हे भगवन्! यदि आप इससे छुटकारा पाने का कोई उपाय जानते हैं तो कृपा कर मुझे बताइए। वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किए श्री विष्णुजी ने कहा—हे ब्राह्मण! श्री सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं, इसलिए तुम उनका पूजन करो, इससे मनुष्य सब दुःखों से मुक्त हो जाता है। ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले श्री भगवान अंतर्धान हो गए।
जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण ने बताया है, मैं उसको अवश्य करूँगा, यह निश्चय कर वह ब्राह्मण अपने घर चला गया। अगले दिन वह ब्राह्मण जल्दी उठा और श्री सत्यनारायणजी का व्रत करने का निश्चय कर भिक्षा माँगने के लिए चल दिया। उस दिन उसको भिक्षा में बहुत धन मिला, जिससे उसने पूजा का सामान खरीदा और घर आकर अपने बंधु-बांधवों के साथ श्री सत्यनारायणजी का व्रत किया।इसके करने से वह ब्राह्मण सब दुःखों से छूटकर अनेक प्रकार के सुख-संपत्तियों से युक्त हुआ। तभी से वह प्रति मास व्रत करने लगा।
इसी प्रकार सत्यनारायणजी का व्रत जो शास्त्र-विधि के अनुसार करेगा, वह सब पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। आगे भी जो मनुष्य पृथ्वी पर श्री सत्यनारायणजी का व्रत करेगा, वह सब दुःखों से छूट जाएगा। इस तरह नारदजी से सत्यनारायण भगवान का कहा हुआ व्रत मैंने आपसे कहा।
तब ऋषियों ने कहा—हे मुनीश्वर! संसार में इस व्रत को सुनकर किस-किस ने इस व्रत को किया है, यह हम सब सुनना चाहते हैं। श्री सूतजी ने कहा—हे मुनियों! जिस-जिस प्राणी ने इस व्रत को किया है, उन सबकी कथा सुनो।
एक समय वह ब्राह्मण धन और ऐश्वर्य के अनुसार बंधु-बांधवों के साथ व्रत-पूजन कर रहा था, कि उसी समय एक लकड़हारा आया। उसने लकड़ियाँ बाहर रख दीं और ब्राह्मण के घर में चला गया। प्यास से व्याकुल लकड़हारे ने ब्राह्मण को व्रत करते देखा। वह प्यास को भूल गया और उसने उस ब्राह्मण को नमस्कार किया और पूछा—हे विप्र! आप यह किसका पूजन कर रहे हैं? इस व्रत से क्या फल मिलता है? कृपा करके मुझे बताइए।
ब्राह्मण ने कहा—सब मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला यह श्री सत्यनारायणजी का व्रत है। इनकी कृपा से ही मेरे यहाँ धन-धान्य आदि की वृद्धि हुई है। ब्राह्मण से इस व्रत के विषय में जानकर वह लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। भगवान का चरणामृत लेकर और भोजन करके वह अपने घर चला गया। अगले दिन लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज शाम को लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा, उसी से भगवान श्री सत्यनारायणजी का उत्तम व्रत करूँगा। मन में ऐसा विचार कर वह लकड़हारा लकड़ियाँ अपने सिर पर रखकर उस नगर में गया जहाँ धनवान लोग रहते थे। उस दिन उसे उन लकड़ियों के चौगुने दाम मिले।
वह बूढ़ा लकड़हारा अत्यन्त प्रसन्न होकर पके केले, शक्कर, शहद, घी, दूध, दही और गेहूँ का चूर्ण इत्यादि श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत की सभी सामग्री लेकर अपने घर आ गया। फिर उसने अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर विधि-विधान के साथ भगवान का पूजन और व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन-पुत्र आदि से युक्त हुआ और संसार के समस्त सुख भोगकर वैकुण्ठ को चला गया।
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का दूसरा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा – तीसरा अध्याय
श्री सूतजी ने कहा—हे श्रेष्ठ मुनियों! अब एक और कथा कहता हूँ। पूर्वकाल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देवस्थान पर जाता तथा गरीबों को धन देकर उनके दुःख दूर करता था। उसकी पत्नी सुन्दर और सती-साध्वी थी। भाँशीला नदी के तट पर उन दोनों ने श्री सत्यनारायण भगवानजी का व्रत किया। साधु नामक एक वैश्य, राजा को व्रत करते देख उनसे पूछने लगा—हे राजन! भक्ति-युक्त चित्त से यह आप क्या कर रहे हैं? मेरी सुनने की इच्छा है।
तब महाराज उल्कामुख ने कहा—हे साधु वैश्य! मैं अपने बंधु-बांधवों के साथ संतान की प्राप्ति के लिए महाशक्तिमान सत्यनारायण भगवानजी का व्रत व पूजन कर रहा हूँ। उसने कहा—हे राजन! मुझे भी इसका सब विधान बताइए। मैं भी आपकी कथानुसार इस व्रत को करूँगा। मुझे कोई संतान नहीं है। विश्वास है कि इससे निश्चय ही मेरे यहाँ भी संतान होगी। राजा से सब विधान सुनकर, व्यापार से निवृत्त होकर वह वैश्य खुशी-खुशी अपने घर आया। वैश्य ने अपनी पत्नी लीलावती से संतान देने वाले उस व्रत का समाचार सुनाया और प्रण किया कि जब हमारे यहाँ संतान होगी तब मैं इस व्रत को करूँगा।
एक दिन उसकी पत्नी लीलावती सांसारिक धर्म में प्रवृत्त होकर गर्भवती हो गई। उसने एक सुन्दर कन्या को जन्म दिया। कन्या का नाम कलावती रखा गया। इसके बाद लीलावती ने अपने पति को स्मरण दिलाया कि आपने जो भगवान का व्रत करने का संकल्प किया था, अब आप उसे पूरा कीजिए। साधु वैश्य ने कहा—हे प्रिये! मैं कन्या के विवाह पर इस व्रत को करूँगा। इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन देकर वह व्यापार करने चला गया।
काफी दिनों के पश्चात वह लौटा तो उसने नगर में बहुत से बालकों के साथ अपनी पुत्री को खेलते देखा। वैश्य ने तत्काल कलावती के लिए कोई सुयोग्य वर तलाश किया। कंचन नगर के एक सुयोग्य वणिक पुत्र से अपने बंधु-बांधवों सहित प्रसन्नचित्त होकर अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया। वैश्य विवाह के समय भी सत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूल गया।
इस पर श्री सत्यनारायण भगवान की लीला हुई। अपने कार्य में कुशल साधु नामक वैश्य अपने जामाता सहित नाव को लेकर व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नगर में गया। दोनों ससुर-जमाई राजा चंद्रकेतु के नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायणजी की माया से प्रेरित एक चोर राजा का धन चुराकर भागा जा रहा था।
राजा के दूतों को अपने पीछे आते देखकर चोर ने घबराकर राजा का धन उस नाव में रख दिया जहाँ ससुर-जमाई रहते थे और स्वयं भाग गया। जब राजा के दूतों ने उस नाव में रखा धन देखा तो उन्होंने दोनों को पकड़कर राजा के पास ले जाकर कहा—हम ये दो चोर पकड़कर लाए हैं, आप आज्ञा दें। राजा ने कारागार में डालने की आज्ञा दे दी।
इस प्रकार राजा की आज्ञा से दोनों को कठोर कारावास में डाल दिया गया और उनका सारा धन भी ले लिया गया। सत्यनारायण भगवान की लीला के अनुसार साधु वैश्य की पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती भी घर पर अत्यन्त दुःखी हो गईं। उनके घर में रखा हुआ धन चोर ले गए।
एक दिन शारीरिक और मानसिक पीड़ा तथा भूख-प्यास से अत्यन्त दुःखी होकर भोजन की चिंता में कलावती एक ब्राह्मण के घर गई। उसने वहाँ श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा। उसने कथा सुनी और प्रसाद ग्रहण कर रात्रि में अपने घर आई। माता ने कलावती से पूछा—हे पुत्री! तू अब तक कहाँ रही और तेरे मन में क्या है?
कलावती बोली—हे माता! मैंने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा है। कलावती के वचन सुनकर लीलावती ने सत्यनारायण भगवान के पूजन की तैयारी की। उसने परिवार और बंधुओं सहित श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन व व्रत किया और वर माँगा कि मेरे पति और दामाद शीघ्र ही घर लौट आएँ तथा हम सबके अपराध क्षमा हों। श्री सत्यनारायण भगवान इस व्रत से संतुष्ट हो गए। उन्होंने राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा—हे राजन! जिन दो वैश्य पुत्रों को तुमने बंदी बना रखा है, वे निर्दोष हैं, उन्हें प्रातःकाल छोड़ देना।
राजा को स्वप्न में वचन देकर भगवान अंतर्धान हो गए। प्रातःकाल राजा चंद्रकेतु ने सभा में सबको अपना स्वप्न सुनाया और सैनिकों को आज्ञा दी कि दोनों वैश्य पुत्रों को कारागार से मुक्त कर सभा में लाया जाए।दोनों ने आते ही राजा को प्रणाम किया। राजा ने उनसे कहा—हे महानुभावो! तुम्हें दैववश ऐसा कठोर दुःख प्राप्त हुआ है, अब तुम्हें कोई भय नहीं है, तुम मुक्त हो।
ऐसा कहकर राजा ने उन्हें नए-नए वस्त्राभूषण दिए तथा उनका जितना धन लिया था उससे दुगुना लौटाकर आदरपूर्वक विदा किया। दोनों वैश्य अपने घर को चल दिए।
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का तीसरा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा – चौथा अध्याय
श्री सूतजी बोले—वैश्य और उसके जामाता ने मंगलाचरण करके यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल पड़े। थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर दंडी वेशधारी भगवान ने उस वैश्य से पूछा—हे वैश्य! तेरी नाव में क्या है? अभिमानी वैश्य हँसता हुआ बोला—हे दंडी! आप व्यर्थ ही क्यों पूछते हैं, क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल और पत्ते भरे हैं। वैश्य के कठोर वचन सुनकर दंडी रूप में भगवान ने कहा—तुम्हारा वचन सत्य हो। ऐसा कहकर वे वहाँ से कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए।
दंडी महाराज के चले जाने के पश्चात वैश्य ने जब नाव को ऊँची उठी हुई देखा तो अचंभित हुआ और नाव में बेल-पत्ते आदि देखकर मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। होश आने पर वह अत्यन्त शोक प्रकट करने लगा। तब उसके जामाता ने कहा—आप शोक न करें, यह दंडी महाराज का शाप है, अतः उन्हीं की शरण में चलना चाहिए, तभी हमारी मनोकामना पूर्ण होगी। जामाता के वचन सुनकर वैश्य दंडी महाराज के पास पहुँचा और भक्ति-भाव से प्रणाम करके बोला—मैंने जो आपसे असत्य वचन कहे थे, उसके लिए मुझे क्षमा करें।
तब दंडी भगवान बोले—हे वणिक पुत्र! मेरी आज्ञा से तुझे बार-बार दुःख प्राप्त हुआ है, तू मेरी पूजा से विमुख हुआ है। तब उसने कहा—हे भगवन्! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके स्वरूप को नहीं जान पाते, तब मैं अज्ञानी भला कैसे जान सकता हूँ। आप प्रसन्न होइए, मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा, मेरी रक्षा कीजिए और पहले के समान मेरी नौका को धन से भर दीजिए। उसके भक्तियुक्त वचन सुनकर भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छा के अनुसार वर देकर अंतर्धान हो गए।
तब ससुर और जामाता दोनों नाव पर आए और देखा कि नाव धन से परिपूर्ण है। फिर वे भगवान श्री सत्यनारायणजी का पूजन कर जामाता सहित अपने नगर की ओर चले। जब वह अपने नगर के निकट पहुँचा तब उसने एक दूत को अपने घर भेजा। दूत ने वैश्य के घर जाकर उसकी पत्नी को प्रणाम किया और कहा—आपके पति अपने दामाद सहित इस नगर के समीप आ गए हैं। लीलावती और उसकी कन्या कलावती उस समय भगवान का पूजन कर रही थीं।
दूत का वचन सुनकर साधु की पत्नी ने बड़े हर्ष के साथ सत्यदेव का पूजन पूर्ण किया और अपनी पुत्री से कहा—मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ, तू भी कार्य पूर्ण कर शीघ्र आना। परन्तु कलावती पूजन एवं प्रसाद छोड़कर अपने पति के दर्शन के लिए चली गई। परन्तु उसको पति का दर्शन प्राप्त नहीं हुआ। नौका को डूबा हुआ तथा कन्या को रोती हुई देखकर वैश्य दुःखी हो गया और बोला—हे प्रभु! मुझसे या मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करो। उसके दीन वचन सुनकर सत्यदेव भगवान प्रसन्न हो गए।
आकाशवाणी हुई—हे वैश्य! तेरी कन्या प्रसाद छोड़कर आई है, इस कारण इसका पति अदृश्य हुआ है, यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटे तो इसका पति अवश्य मिलेगा। आकाशवाणी सुनकर कलावती घर पहुँची, पूजन कर प्रसाद खाया और फिर आकर अपने पति के दर्शन किए। तत्पश्चात वैश्य ने वहीं बंधु-बांधवों सहित सत्यदेव का विधिपूर्वक पूजन किया। वह इस लोक का सुख भोगकर अंत में स्वर्गलोक को गया।
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चौथा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा – पाँचवाँ अध्याय
सूतजी बोले— हे ऋषियों! अब मैं एक और कथा सुनाता हूँ, उसे भी ध्यानपूर्वक सुनो। प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भी भगवान सत्यनारायण का प्रसाद त्याग कर बहुत अधिक दुःख सहन किया। एक बार वह वन में जाकर वन्य पशुओं का शिकार करने के बाद बरगद के पेड़ के नीचे आया। वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से अपने बंधुओं सहित श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन करते हुए देखा।
अभिमानवश राजा उन्हें देखकर भी पूजा-स्थान में नहीं गया और न ही उसने भगवान को नमस्कार किया। ग्वालों ने राजा को प्रसाद दिया, लेकिन उसने वह प्रसाद ग्रहण नहीं किया और प्रसाद को वहीं छोड़कर अपने नगर को चला गया।
जब वह नगर पहुँचा तो उसने वहाँ सब कुछ तहस-नहस पाया। तब वह शीघ्र ही समझ गया कि यह सब भगवान सत्यनारायण की लीला है। वह पुनः ग्वालों के पास गया और विधिपूर्वक पूजन करके प्रसाद ग्रहण किया। तब श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से उसका सब कुछ पहले जैसा हो गया। दीर्घकाल तक सुख भोगने के बाद मरणोपरांत उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई।
जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को करता है, उसे भगवान सत्यनारायण की अनुकंपा से धन-धान्य की प्राप्ति होती है। निर्धन व्यक्ति धनी बन जाता है और भयमुक्त होकर जीवन व्यतीत करता है। संतानहीन मनुष्य को संतान-सुख प्राप्त होता है और सभी मनोरथ पूर्ण होने पर मनुष्य अंतकाल में वैकुण्ठधाम को प्राप्त करता है।
सूतजी बोले— जिन्होंने पहले इस व्रत को किया है, अब मैं उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूँ। वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने अगले जन्म में सुदामा बनकर भगवान की भक्ति द्वारा मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारे ने अगले जन्म में निषाद बनकर मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नामक राजा अगले जन्म में राजा दशरथ बनकर वैकुण्ठ को गए। साधु नाम के वैश्य ने मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर महान धर्म का पालन किया और मोक्ष प्राप्त किया। महाराज तुंगध्वज ने स्वयंभू होकर भगवान की भक्ति में लीन रहकर कर्म किए और अंत में मोक्ष प्राप्त किया।
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पांचवा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
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