संकष्टी चतुर्थी 2026: महीने अनुसार सूची, व्रत विधि और महत्व

संकष्टी चतुर्थी 2026 भगवान गणेश को समर्पित मासिक व्रत है, जो प्रत्येक चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में संकष्टी चतुर्थी कुल 12 बार आएगी। प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन के बाद गणेश पूजा और व्रत पारण किया जाता है।

संकष्टी चतुर्थी 2026

Table of Contents

संकष्टी चतुर्थी क्या है?

संकष्टी चतुर्थी हिन्दू पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है, जो भगवान गणेश को समर्पित होता है। “संकष्टी” शब्द का अर्थ है—कष्टों से मुक्ति। इसी कारण यह व्रत जीवन में आने वाली बाधाओं, मानसिक तनाव, पारिवारिक समस्याओं और कार्यों में रुकावट से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है। यह व्रत प्रत्येक चंद्र मास में एक बार आता है और वर्ष में बारह बार संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है।

हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा गया है। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन की परंपरा इसी कारण है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत इस मान्यता को और मजबूत करता है कि सच्ची श्रद्धा और संयम के साथ की गई गणेश उपासना जीवन के कठिन मार्गों को सरल बना देती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों द्वारा किया जाता है जो कार्य, व्यापार, शिक्षा या पारिवारिक जीवन में बार-बार आने वाली समस्याओं से परेशान रहते हैं।

संकष्टी चतुर्थी की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि इस दिन पूजा और व्रत पारण चंद्र दर्शन के बाद किया जाता है। दिन भर उपवास रखने के बाद रात में चंद्रमा के दर्शन कर भगवान गणेश की पूजा की जाती है और फिर व्रत खोला जाता है। यह परंपरा अन्य व्रतों से संकष्टी चतुर्थी को अलग बनाती है।

ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में यह व्रत समान श्रद्धा से किया जाता है। कई परिवारों में यह व्रत पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। महिलाएं, पुरुष, विद्यार्थी और नौकरीपेशा लोग—सभी अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार इस व्रत का पालन करते हैं। संकष्टी चतुर्थी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संयम, धैर्य और आस्था का प्रतीक है।

इस प्रकार संकष्टी चतुर्थी 2026 का व्रत न केवल भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने का माध्यम है, बल्कि यह व्यक्ति को मानसिक शांति और आत्मबल भी प्रदान करता है।

संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व हिन्दू शास्त्रों और लोक परंपराओं में स्पष्ट रूप से वर्णित है। भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक और शुभता का देवता माना गया है। संकष्टी चतुर्थी पर उनकी पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है। यही कारण है कि इस व्रत को विशेष रूप से कष्ट निवारण व्रत कहा गया है।

आध्यात्मिक दृष्टि से संकष्टी चतुर्थी आत्मसंयम का अभ्यास कराती है। दिन भर उपवास रखना, इंद्रियों पर नियंत्रण रखना और रात्रि में चंद्र दर्शन तक धैर्य बनाए रखना व्यक्ति को मानसिक दृढ़ता प्रदान करता है। चंद्रमा को मन का कारक माना गया है और गणेश जी को बुद्धि का। जब चंद्र दर्शन के बाद गणेश पूजा की जाती है, तो मन और बुद्धि के संतुलन का प्रतीक बनता है।

शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से ऋण, रोग, भय और विवाद जैसी समस्याओं से राहत मिलती है। विद्यार्थियों के लिए यह व्रत एकाग्रता बढ़ाने वाला माना गया है, जबकि गृहस्थों के लिए पारिवारिक सुख और स्थिरता का माध्यम। व्यापारियों और नौकरीपेशा लोगों के लिए यह व्रत कार्यों में आ रही बाधाओं को दूर करने की कामना से किया जाता है।

सामाजिक दृष्टि से भी संकष्टी चतुर्थी का महत्व है। यह व्रत व्यक्ति को सादगी, अनुशासन और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा देता है। परिवार में एक साथ पूजा करने से आपसी सामंजस्य बढ़ता है और धार्मिक संस्कार मजबूत होते हैं।

इस प्रकार संकष्टी चतुर्थी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भक्ति, संयम और आत्मबल का ऐसा अवसर है, जो जीवन को संतुलित और शांत बनाने में सहायक होता है।

संकष्टी चतुर्थी और विनायक चतुर्थी में अंतर

बहुत से लोगों के मन में संकष्टी चतुर्थी और विनायक चतुर्थी को लेकर भ्रम रहता है। दोनों ही व्रत भगवान गणेश को समर्पित हैं, लेकिन इनके समय, विधि और महत्व में स्पष्ट अंतर है। इन दोनों को सही रूप में समझना आवश्यक है, ताकि व्रत का पालन सही तरीके से किया जा सके।

विनायक चतुर्थी शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन सुबह या दिन में भगवान गणेश की पूजा की जाती है और सामान्यतः उपवास सूर्योदय के साथ ही रखा जाता है। विनायक चतुर्थी का संबंध शुभ आरंभ, नई योजनाओं और सकारात्मक शुरुआत से माना जाता है। कई लोग इसे छोटे स्तर पर भी मनाते हैं।

वहीं संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को आती है और इसका व्रत अधिक कठोर माना जाता है। इस दिन पूरे दिन उपवास रखा जाता है और चंद्र दर्शन के बाद ही पूजा और पारण किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी का उद्देश्य विशेष रूप से जीवन के कष्टों और बाधाओं से मुक्ति पाना होता है।

एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि संकष्टी चतुर्थी के प्रत्येक मास का एक अलग नाम होता है, जैसे—जया संकष्टी, अंगारकी संकष्टी आदि, जबकि विनायक चतुर्थी में यह नाम परंपरा नहीं पाई जाती। जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जिसे अत्यंत फलदायी माना गया है।

इस प्रकार, दोनों व्रत भगवान गणेश को समर्पित होने के बावजूद अपने उद्देश्य और विधि में भिन्न हैं। सही जानकारी के साथ व्रत करने से ही उसका पूर्ण फल प्राप्त होता है।

संकष्टी चतुर्थी 2026 – VERIFIED DATE LIST (PANCHANG-BASED)

माहतिथिदिनविशेष नोट
जनवरी6 जनवरी 2026मंगलवारपहली संकष्टी (अंगारकी)
फरवरी5 फरवरी 2026गुरूवारसंकष्टी
मार्च6 मार्च 2026शुक्रवारसंकष्टी
अप्रैल5 अप्रैल 2026रविवारसंकष्टी
मई5 मई 2026मंगलवारअंगारकी संकष्टी
जून3 जून 2026बुधवारसंकष्टी
जुलाई3 जुलाई 2026शुक्रवारसंकष्टी
अगस्त2 अगस्त 2026रविवारसंकष्टी
अगस्त (extra)31 अगस्त 2026सोमवारकई स्रोतों पर यह भी स्नकष्टी सूचीबद्ध है
सितंबर29 सितंबर 2026मंगलवारअंगारकी संकष्टी
अक्टूबर29 अक्टूबर 2026गुरूवारसंकष्टी
नवंबर27 नवंबर 2026शुक्रवारसंकष्टी
दिसंबर26 दिसंबर 2026शनिवारसंकष्टी

महीने अनुसार सम्पूर्ण सूची

जनवरी 2026 की संकष्टी चतुर्थी

जनवरी 2026 में आने वाली संकष्टी चतुर्थी वर्ष की पहली संकष्टी चतुर्थी होती है। यह समय पौष मास और माघ मास के संधिकाल से जुड़ा रहता है, जब शीत ऋतु अपने चरम पर होती है। इस माह की संकष्टी चतुर्थी को लोग नए वर्ष की शुरुआत में आने वाले विघ्नों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से विशेष श्रद्धा के साथ करते हैं।

जनवरी की संकष्टी चतुर्थी का संबंध मन की शांति और पारिवारिक स्थिरता से जोड़ा जाता है। ठंड के मौसम में जब मन आलस्य और उदासी की ओर झुकता है, तब यह व्रत व्यक्ति को संयम और धैर्य का अभ्यास कराता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा करने से मानसिक तनाव कम होने की मान्यता है।

कई परिवारों में जनवरी की संकष्टी चतुर्थी पर विशेष रूप से यह कामना की जाती है कि आने वाला पूरा वर्ष बाधा-रहित रहे। विद्यार्थी वर्ग इस व्रत को एकाग्रता और पढ़ाई में सफलता के लिए करते हैं, जबकि गृहस्थ लोग पारिवारिक सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।

पूजा विधि सामान्य संकष्टी चतुर्थी जैसी ही रहती है। दिन भर उपवास रखकर रात्रि में चंद्र दर्शन के बाद गणेश पूजा की जाती है। इस समय मौसम को ध्यान में रखते हुए हल्का और सात्त्विक भोजन करने की परंपरा है।

इस प्रकार जनवरी 2026 की संकष्टी चतुर्थी पूरे वर्ष के लिए शुभ आरंभ और मानसिक संतुलन का प्रतीक मानी जाती है।

फरवरी 2026 की संकष्टी चतुर्थी

फरवरी 2026 की संकष्टी चतुर्थी माघ मास से जुड़ी हुई होती है, जिसे हिन्दू धर्म में अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। माघ मास स्वयं स्नान, दान और तपस्या का महीना है, इसलिए इस मास की संकष्टी चतुर्थी का महत्व और भी बढ़ जाता है।

इस माह की संकष्टी चतुर्थी विशेष रूप से कष्ट निवारण और आत्मशुद्धि से जुड़ी मानी जाती है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार माघ मास में किए गए व्रत शीघ्र फल देने वाले होते हैं। इसलिए कई श्रद्धालु इस संकष्टी चतुर्थी को पूरे नियम और श्रद्धा के साथ करते हैं।

फरवरी की संकष्टी चतुर्थी पर गणेश पूजा के साथ-साथ दान और सेवा का भी विशेष महत्व बताया गया है। गरीबों को भोजन, वस्त्र या अपनी क्षमता अनुसार सहायता देना इस दिन शुभ माना जाता है। इससे व्रत का पुण्य और अधिक बढ़ता है।

इस व्रत का प्रभाव विशेष रूप से उन लोगों पर माना जाता है जो लंबे समय से किसी समस्या या बाधा से जूझ रहे होते हैं। नौकरी, व्यापार या स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों में यह व्रत आशा और धैर्य का संचार करता है।

इस प्रकार फरवरी 2026 की संकष्टी चतुर्थी भक्ति, दान और संयम का संतुलित रूप प्रस्तुत करती है।

मार्च 2026 की संकष्टी चतुर्थी

मार्च 2026 की संकष्टी चतुर्थी फाल्गुन मास से संबंधित होती है। फाल्गुन मास उल्लास, उत्सव और सामाजिक मेल-मिलाप का महीना माना जाता है। इसी माह होली जैसे पर्व आते हैं, इसलिए इस संकष्टी चतुर्थी का महत्व संतुलन बनाए रखने से जुड़ा हुआ है।

मार्च की संकष्टी चतुर्थी यह सिखाती है कि उत्सव और आनंद के बीच भी संयम और अनुशासन आवश्यक है। भगवान गणेश की पूजा व्यक्ति को विवेक और संतुलित निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करती है। इस माह का व्रत विशेष रूप से क्रोध, अहंकार और जल्दबाजी जैसे दोषों को नियंत्रित करने से जोड़ा जाता है।

फाल्गुन मास की संकष्टी चतुर्थी पर पारिवारिक पूजा का विशेष महत्व है। कई घरों में पूरे परिवार के साथ मिलकर गणेश पूजन किया जाता है, जिससे आपसी संबंध मजबूत होते हैं। यह व्रत पारिवारिक सामंजस्य और सामाजिक संतुलन का प्रतीक बन जाता है।

मार्च की संकष्टी चतुर्थी यह संदेश देती है कि आनंद और भक्ति दोनों को साथ-साथ जीवन में स्थान दिया जाना चाहिए।

अप्रैल 2026 की संकष्टी चतुर्थी

अप्रैल 2026 की संकष्टी चतुर्थी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आती है। चैत्र मास हिन्दू पंचांग का प्रारंभिक महीना माना जाता है और इसे नए आरंभ, शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा से जोड़ा जाता है। ऐसे समय में आने वाली संकष्टी चतुर्थी का महत्व विशेष रूप से नई शुरुआत को बाधा-मुक्त बनाने से जुड़ा माना गया है।

अप्रैल की संकष्टी चतुर्थी उन लोगों के लिए विशेष मानी जाती है जो जीवन में कोई नया कार्य, व्यवसाय, अध्ययन या योजना आरंभ करना चाहते हैं। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा गया है, इसलिए इस तिथि पर उनकी उपासना कर यह कामना की जाती है कि आने वाले समय में कोई अवरोध न आए। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार चैत्र मास में किए गए व्रत शीघ्र फल देने वाले होते हैं।

इस दिन व्रत करने वाले भक्त प्रातः स्नान कर दिन भर संयम रखते हैं। संकष्टी चतुर्थी की विशेष परंपरा के अनुसार रात्रि में चंद्र उदय के बाद ही गणेश पूजा और व्रत पारण किया जाता है। चंद्र दर्शन को मन की शांति और संतुलन से जोड़ा गया है, जबकि गणेश पूजा बुद्धि और विवेक प्रदान करने वाली मानी जाती है।

अप्रैल माह में मौसम परिवर्तन के कारण मानसिक अस्थिरता या थकान महसूस हो सकती है। ऐसे समय में यह व्रत व्यक्ति को धैर्य, अनुशासन और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है। पारिवारिक दृष्टि से भी यह संकष्टी चतुर्थी सौहार्द और समझ को बढ़ाने वाली मानी जाती है।

इस प्रकार अप्रैल 2026 की संकष्टी चतुर्थी नए आरंभ, स्थिरता और विघ्न-निवारण का प्रतीक बनती है।

मई 2026 की संकष्टी चतुर्थी

मई 2026 की संकष्टी चतुर्थी वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आती है। वैशाख मास हिन्दू धर्म में दान, संयम और धर्माचरण के लिए विशेष माना गया है। इस मास की संकष्टी चतुर्थी का महत्व मानसिक शांति और पारिवारिक संतुलन से जोड़ा जाता है।

ग्रीष्म ऋतु के प्रारंभिक चरण में आने के कारण मई माह में शरीर और मन दोनों पर गर्मी का प्रभाव पड़ता है। ऐसे समय में संकष्टी चतुर्थी का व्रत व्यक्ति को क्रोध, अधैर्य और मानसिक तनाव से दूर रहने की सीख देता है। भगवान गणेश की उपासना से विवेक और सहनशीलता बढ़ने की मान्यता है।

मई 2026 में संकष्टी चतुर्थी यदि मंगलवार को पड़ती है, तो उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी भी माना जाता है, जिसे अत्यंत प्रभावशाली समझा जाता है। हालांकि, व्रत का मूल उद्देश्य दिन विशेष से अधिक श्रद्धा और संयम पर आधारित होता है।

इस दिन भक्त अपनी क्षमता अनुसार फलाहार या जल ग्रहण करते हैं और रात्रि में चंद्र उदय के पश्चात गणेश पूजा कर व्रत का पारण करते हैं। वैशाख मास में किया गया गणेश व्रत शास्त्रों में विशेष पुण्यकारी बताया गया है।

मई की संकष्टी चतुर्थी यह संदेश देती है कि कठिन मौसम और परिस्थितियों में भी यदि मन को संतुलित रखा जाए, तो जीवन की बाधाएँ स्वतः कम होने लगती हैं।

जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी

जून 2026 की संकष्टी चतुर्थी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आती है। ज्येष्ठ मास को तप, संयम और सहनशीलता का महीना कहा गया है। इस समय सूर्य की तीव्रता अधिक होती है, जिससे व्रत और साधना कठिन मानी जाती है, लेकिन साथ ही इसे अत्यंत फलदायी भी कहा गया है।

ज्येष्ठ मास की संकष्टी चतुर्थी का महत्व विशेष रूप से धैर्य, आत्मनियंत्रण और मानसिक दृढ़ता से जुड़ा होता है। यह व्रत व्यक्ति को यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखना ही वास्तविक साधना है। भगवान गणेश की आराधना से मानसिक शक्ति और विवेक बढ़ने की मान्यता है।

इस दिन व्रत करने वाले श्रद्धालु अत्यंत सादगी का पालन करते हैं। कुछ लोग केवल जल या फल ग्रहण करते हैं, जबकि कई लोग स्वास्थ्य के अनुसार हल्का आहार लेते हैं। रात्रि में चंद्र उदय के बाद गणेश पूजा कर व्रत पारण किया जाता है। चंद्र दर्शन यहाँ विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह मन को शीतलता प्रदान करता है।

जून की संकष्टी चतुर्थी यह संदेश देती है कि कठिन तपस्या के बाद ही सच्चा फल प्राप्त होता है। यह व्रत न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि मानसिक और व्यवहारिक जीवन में भी स्थिरता लाने वाला माना गया है।

जुलाई 2026 की संकष्टी चतुर्थी

जुलाई 2026 की संकष्टी चतुर्थी आषाढ़ मास से जुड़ी होती है। यह समय वर्षा ऋतु की शुरुआत का होता है, जब प्रकृति में हरियाली आती है और जीवन में ठहराव व चिंतन की आवश्यकता बढ़ जाती है। आषाढ़ मास में किया गया संकष्टी व्रत व्यक्ति को अस्थिरता से स्थिरता की ओर ले जाने का प्रतीक माना जाता है।

इस माह की संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश से यह प्रार्थना की जाती है कि वे जीवन में आने वाले अनिश्चित हालात में सही मार्गदर्शन दें। वर्षा ऋतु के कारण कार्यों में विलंब, स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव और मन में भ्रम की स्थिति बन सकती है। ऐसे समय में यह व्रत विवेक और धैर्य बढ़ाने वाला माना जाता है।

आषाढ़ मास की संकष्टी चतुर्थी का सामाजिक महत्व भी है। यह व्रत व्यक्ति को अनावश्यक जल्दबाजी से बचने और परिस्थितियों को स्वीकार करने की सीख देता है। परिवार के साथ पूजा करने से सामूहिक निर्णयों में समझ और संतुलन आता है।

इस प्रकार जुलाई 2026 की संकष्टी चतुर्थी जीवन में स्थिरता, संयम और विवेक को मजबूत करने का अवसर प्रदान करती है।

अगस्त 2026 की संकष्टी चतुर्थी

अगस्त 2026 की संकष्टी चतुर्थी श्रावण मास से संबंधित होती है। श्रावण मास भक्ति और विशेष रूप से भगवान शिव की आराधना के लिए जाना जाता है, लेकिन इस मास की संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश की उपासना के माध्यम से भक्ति को संतुलन प्रदान करती है।

श्रावण की संकष्टी चतुर्थी का संबंध मन की शुद्धि और भावनात्मक स्थिरता से जोड़ा जाता है। इस समय वर्षा के कारण मन अधिक संवेदनशील हो जाता है। ऐसे में गणेश उपासना व्यक्ति को भावनाओं पर नियंत्रण रखने और सकारात्मक सोच बनाए रखने में सहायता करती है।

इस माह का व्रत पारिवारिक रिश्तों में मधुरता लाने के लिए भी किया जाता है। कई श्रद्धालु इस दिन यह कामना करते हैं कि पारिवारिक विवाद और मानसिक तनाव दूर हों। श्रावण मास में किया गया संकष्टी व्रत भक्ति और संयम का सुंदर मेल प्रस्तुत करता है।

अगस्त 2026 की संकष्टी चतुर्थी यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सही आचरण और संतुलित व्यवहार में भी प्रकट होती है।

सितंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी

सितंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी भाद्रपद मास से जुड़ी होती है। यह मास स्वयं भगवान गणेश के जन्मोत्सव से संबंधित माना जाता है, इसलिए इस माह की संकष्टी चतुर्थी का महत्व और भी बढ़ जाता है।

भाद्रपद मास की संकष्टी चतुर्थी विशेष रूप से बुद्धि, निर्णय-शक्ति और कार्य-सफलता से जुड़ी मानी जाती है। इस समय कई लोग नए कार्य, अध्ययन या जीवन से जुड़े बड़े निर्णय लेते हैं। ऐसे में गणेश जी की आराधना मार्गदर्शन और स्पष्टता प्रदान करती है।

इस माह का व्रत विद्यार्थियों और युवाओं के लिए विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। गणेश जी को विद्या और बुद्धि का देवता माना गया है, इसलिए यह व्रत एकाग्रता और आत्मविश्वास बढ़ाने का माध्यम बनता है।

सितंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी यह संदेश देती है कि सही निर्णय ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता होते हैं।

अक्टूबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी

अक्टूबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आती है। आश्विन मास हिन्दू पंचांग में शक्ति उपासना, आत्मसंयम और धर्म की विजय से जुड़ा माना जाता है। इसी माह शारदीय नवरात्रि और विजयादशमी जैसे पर्व आते हैं, जिसके कारण वातावरण में आध्यात्मिक चेतना और ऊर्जा बनी रहती है। ऐसे समय में आने वाली संकष्टी चतुर्थी का महत्व आंतरिक संघर्षों पर विजय से जोड़ा जाता है।

अक्टूबर की संकष्टी चतुर्थी उन लोगों के लिए विशेष मानी जाती है जो मानसिक दबाव, भय, असमंजस या निर्णय संबंधी उलझनों से गुजर रहे होते हैं। भगवान गणेश को बुद्धि और विवेक का देवता माना गया है, इसलिए इस दिन उनकी उपासना कर मन को स्थिर करने और सही मार्ग चुनने की कामना की जाती है। आश्विन मास में किया गया गणेश व्रत आत्मविश्वास और धैर्य को बढ़ाने वाला माना जाता है।

इस दिन व्रत रखने वाले भक्त दिन भर संयम रखते हैं और रात्रि में चंद्र उदय के बाद गणेश पूजा कर व्रत का पारण करते हैं। चंद्र दर्शन को मन की शांति से जोड़ा गया है, जबकि गणेश पूजा बुद्धि और विवेक प्रदान करने वाली मानी जाती है। इस संतुलन के कारण यह व्रत मानसिक रूप से अत्यंत प्रभावी माना जाता है।

अक्टूबर की संकष्टी चतुर्थी यह संदेश देती है कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, यदि मन और बुद्धि संतुलित रहें तो हर बाधा पर विजय पाई जा सकती है। इस प्रकार यह व्रत आत्मिक शक्ति और विवेक को सुदृढ़ करने का अवसर बनता है।

नवंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी

नवंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में आती है। कार्तिक मास को हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र और पुण्यकारी माना गया है। इस मास में दीपदान, स्नान और भक्ति का विशेष महत्व बताया गया है। ऐसे धार्मिक वातावरण में आने वाली संकष्टी चतुर्थी का महत्व आत्मिक शुद्धि और कृतज्ञता से जुड़ा होता है।

कार्तिक मास की संकष्टी चतुर्थी व्यक्ति को अपने कर्मों का आत्ममूल्यांकन करने की प्रेरणा देती है। यह व्रत यह सिखाता है कि जीवन में केवल बाहरी उपलब्धियाँ ही नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष और सही आचरण भी महत्वपूर्ण हैं। भगवान गणेश की उपासना से अहंकार, असंतोष और भ्रम को दूर करने की मान्यता है।

इस दिन व्रत करने वाले भक्त सादगी और संयम का विशेष ध्यान रखते हैं। दिन में फलाहार या जल ग्रहण किया जाता है और रात्रि में चंद्र उदय के बाद गणेश पूजा कर व्रत पारण किया जाता है। कार्तिक मास में चंद्र दर्शन को विशेष रूप से पुण्यकारी माना गया है, क्योंकि यह मन को शीतलता और स्थिरता प्रदान करता है।

नवंबर की संकष्टी चतुर्थी यह संदेश देती है कि जब व्यक्ति कृतज्ञता और विनम्रता के साथ जीवन जीता है, तो बाधाएँ स्वतः कम होने लगती हैं। इस प्रकार यह व्रत संतोष, शुद्धता और आत्मिक संतुलन को बढ़ाने वाला माना जाता है।

दिसंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी

दिसंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी मार्गशीर्ष और पौष मास के संधिकाल में आती है। यह समय वर्ष के अंतिम चरण का होता है, जब व्यक्ति स्वाभाविक रूप से बीते समय पर विचार करता है और आने वाले वर्ष के लिए योजनाएँ बनाता है। ऐसे समय में संकष्टी चतुर्थी का महत्व आत्ममंथन और नए संकल्प से जुड़ा माना गया है।

मार्गशीर्ष मास को शास्त्रों में भक्ति और ज्ञान का महीना कहा गया है। इस मास की संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश की उपासना के माध्यम से व्यक्ति को यह सिखाती है कि हर नए आरंभ से पहले मन और बुद्धि का शुद्ध होना आवश्यक है। यह व्रत पुराने तनाव, असफलताओं और मानसिक बोझ को छोड़ने की प्रेरणा देता है।

दिसंबर की संकष्टी चतुर्थी पर व्रत रखने वाले श्रद्धालु अत्यंत सरल और सात्त्विक आचरण अपनाते हैं। ठंड के मौसम में यह व्रत संयम और अनुशासन का अभ्यास कराता है। रात्रि में चंद्र उदय के बाद गणेश पूजा कर व्रत पारण किया जाता है, जिससे मन में शांति और स्पष्टता का अनुभव होता है।

यह संकष्टी चतुर्थी यह संदेश देती है कि हर अंत एक नए आरंभ की तैयारी होता है। यदि व्यक्ति श्रद्धा, संयम और विवेक के साथ आगे बढ़े, तो आने वाला समय अधिक संतुलित और सफल हो सकता है। इस प्रकार दिसंबर 2026 की संकष्टी चतुर्थी नए वर्ष के लिए मानसिक और आत्मिक तैयारी का प्रतीक बनती है।

अंगारकी संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व

जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तब उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। हिन्दू मान्यताओं में यह संकष्टी चतुर्थी का सबसे श्रेष्ठ और प्रभावशाली रूप माना गया है। “अंगारक” शब्द का संबंध मंगल ग्रह से है, और मंगल ग्रह साहस, ऊर्जा और पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। इसलिए मंगलवार की संकष्टी चतुर्थी अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार अंगारकी संकष्टी चतुर्थी पर किया गया व्रत कर्ज, रोग, शत्रु बाधा और लंबे समय से चली आ रही समस्याओं से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है। विशेष रूप से वे लोग जो बार-बार प्रयास करने के बाद भी सफलता नहीं पा रहे होते हैं, उनके लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

अंगारकी संकष्टी चतुर्थी का महत्व केवल भौतिक समस्याओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी प्रभाव डालती है। इस दिन की गई गणेश उपासना से व्यक्ति में आत्मविश्वास और निर्णय-शक्ति बढ़ती है। मंगल के प्रभाव के कारण यह व्रत साहस और दृढ़ता प्रदान करता है।

कई स्थानों पर अंगारकी संकष्टी चतुर्थी को सामान्य संकष्टी से अधिक कठोर माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन निर्जल या केवल फलाहार व्रत रखते हैं। पूजा में विशेष रूप से लाल फूल, दूर्वा और मोदक अर्पित किए जाते हैं।

इस प्रकार अंगारकी संकष्टी चतुर्थी 2026 भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त करने का एक दुर्लभ और शक्तिशाली अवसर मानी जाती है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत विधि (सरल और पूर्ण)

संकष्टी चतुर्थी 2026 व्रत विधि

संकष्टी चतुर्थी की व्रत विधि सरल है, लेकिन इसमें संयम और श्रद्धा का विशेष महत्व होता है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों को नियंत्रित करना है।

व्रत की शुरुआत प्रातःकाल स्नान से होती है। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर भगवान गणेश का ध्यान किया जाता है। दिन भर उपवास रखा जाता है। अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार लोग निर्जल, फलाहार या केवल जल ग्रहण कर सकते हैं। दिन में पूजा नहीं की जाती, बल्कि पूजा का मुख्य समय चंद्र दर्शन के बाद माना गया है।

सायंकाल पूजा की तैयारी की जाती है। पूजा स्थान को स्वच्छ कर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। दीपक जलाकर धूप, फूल और दूर्वा अर्पित की जाती है। मोदक या लड्डू का भोग लगाया जाता है। इसके बाद गणेश जी के नामों का स्मरण या सरल मंत्रों का जाप किया जाता है।

रात्रि में जब चंद्रमा दिखाई दे, तब चंद्र दर्शन कर जल अर्पित किया जाता है। चंद्र दर्शन के बाद गणेश पूजा पूर्ण की जाती है और तभी व्रत का पारण किया जाता है। पारण में हल्का, सात्त्विक भोजन करना उचित माना जाता है।

संकष्टी चतुर्थी की व्रत विधि यह सिखाती है कि सही समय पर किया गया संयम और भक्ति जीवन में संतुलन और शांति लाती है।

संकष्टी चतुर्थी में क्या खाएं और क्या न खाएं

संकष्टी चतुर्थी के व्रत में आहार का विशेष महत्व होता है। इस दिन सात्त्विक और हल्का भोजन करने की परंपरा है। दिन में अधिकांश लोग फल, दूध, दही, नारियल पानी या केवल जल ग्रहण करते हैं। कुछ लोग केवल एक समय फलाहार लेते हैं।

व्रत के पारण में सादा भोजन करना उचित माना गया है। उबली सब्जियां, फल, दूध और बिना मसाले का भोजन व्रत के लिए उपयुक्त होता है। तामसिक और भारी भोजन से बचना चाहिए।

इस दिन मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का सेवन पूर्ण रूप से वर्जित माना गया है। अत्यधिक मसालेदार, तला-भुना और जंक फूड भी व्रत के अनुकूल नहीं माने जाते। साथ ही क्रोध, कटु वचन और नकारात्मक विचारों से भी दूर रहना चाहिए।

संकष्टी चतुर्थी का वास्तविक उद्देश्य केवल भोजन नियंत्रण नहीं, बल्कि विचार और व्यवहार की शुद्धता है। संयमित आहार से मन शांत रहता है और पूजा का प्रभाव बढ़ता है।

संकष्टी चतुर्थी के लाभ (धार्मिक और व्यावहारिक)

संकष्टी चतुर्थी के व्रत के लाभ धार्मिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर बताए गए हैं। धार्मिक दृष्टि से यह व्रत भगवान गणेश की विशेष कृपा दिलाने वाला माना गया है। इससे विघ्न, बाधा और भय दूर होते हैं।

मानसिक स्तर पर यह व्रत धैर्य, आत्मसंयम और सकारात्मक सोच को बढ़ाता है। चंद्र दर्शन के बाद पूजा करने की परंपरा मन को स्थिर करती है। नियमित रूप से यह व्रत करने वाले लोगों में निर्णय-क्षमता और आत्मविश्वास बढ़ने की मान्यता है।

व्यावहारिक जीवन में यह व्रत अनुशासन सिखाता है। उपवास और नियमों का पालन व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में संयम अपनाने की प्रेरणा देता है। पारिवारिक जीवन में शांति और सामंजस्य बढ़ाने के लिए भी यह व्रत उपयोगी माना जाता है।

इस प्रकार संकष्टी चतुर्थी का व्रत केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि जीवन सुधार का साधन माना जाता है।

संकष्टी चतुर्थी में होने वाली सामान्य गलतियाँ

संकष्टी चतुर्थी के व्रत में कई बार अनजाने में गलतियाँ हो जाती हैं। सबसे सामान्य गलती यह है कि लोग चंद्र दर्शन से पहले व्रत तोड़ देते हैं, जबकि शास्त्रों में चंद्र दर्शन के बाद ही पारण करने की परंपरा बताई गई है।

दूसरी बड़ी गलती यह है कि लोग व्रत को केवल भोजन त्याग तक सीमित मान लेते हैं। जबकि संकष्टी चतुर्थी का उद्देश्य मानसिक और व्यवहारिक संयम भी है। क्रोध, कटु भाषा और नकारात्मक सोच व्रत के प्रभाव को कम कर देती है।

कुछ लोग स्वास्थ्य की परवाह किए बिना कठोर व्रत रखते हैं, जो उचित नहीं है। गर्भवती महिलाएं, वृद्ध और बीमार व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार नियम अपनाएं। व्रत में दिखावा और अहंकार भी एक सामान्य भूल है।

इन गलतियों से बचकर यदि श्रद्धा और समझ के साथ व्रत किया जाए, तो संकष्टी चतुर्थी का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

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❓संकष्टी चतुर्थी 2026 – (FAQs)

प्रश्न 1: संकष्टी चतुर्थी 2026 में कितनी बार आएगी?

उत्तर: वर्ष 2026 में संकष्टी चतुर्थी कुल 12 बार आएगी, क्योंकि यह हर चंद्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। प्रत्येक माह की संकष्टी चतुर्थी का अलग धार्मिक भाव और महत्व बताया गया है।

प्रश्न 2: संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन क्यों आवश्यक है?

उत्तर: संकष्टी चतुर्थी में चंद्र दर्शन के बाद ही पूजा और व्रत पारण की परंपरा है। चंद्रमा मन का कारक माना जाता है और गणेश जी बुद्धि के देवता हैं। दोनों के संतुलन से मानसिक शांति और विवेक की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 3: क्या महिलाएं और पुरुष दोनों यह व्रत कर सकते हैं?

उत्तर: हां, संकष्टी चतुर्थी का व्रत महिलाएं, पुरुष, विद्यार्थी और गृहस्थ—सभी कर सकते हैं। यह व्रत किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है।

प्रश्न 4: अंगारकी संकष्टी चतुर्थी क्या होती है?

उत्तर: जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो उसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इसे सभी संकष्टी चतुर्थियों में सबसे फलदायी माना गया है।

प्रश्न 5: क्या बीमार व्यक्ति संकष्टी चतुर्थी का व्रत कर सकते हैं?

उत्तर: बीमार, वृद्ध या गर्भवती व्यक्ति अपनी क्षमता अनुसार फलाहार या केवल पूजा कर सकते हैं। कठोर व्रत अनिवार्य नहीं है।

प्रश्न 6: संकष्टी चतुर्थी का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य जीवन के कष्टों से मुक्ति, मानसिक शांति, संयम और भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करना है।

प्रश्न 7. संकष्टी चतुर्थी 2026 कब कब है?

उत्तर: 2026 में संकष्टी चतुर्थी हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को कुल 12 बार आएगी। सभी तिथियाँ ऊपर तालिका में दी गई हैं।

प्रश्न 8. सबसे शक्तिशाली संकष्टी चतुर्थी कौन सी है?

उत्तर: मंगलवार को पड़ने वाली अंगारकी संकष्टी चतुर्थी को सबसे शक्तिशाली माना जाता है।

निष्कर्ष – संकष्टी चतुर्थी 2026 का सार

संकष्टी चतुर्थी 2026 केवल एक मासिक व्रत नहीं, बल्कि संयम, श्रद्धा और आत्मबल का प्रतीक है। वर्ष भर आने वाली बारह संकष्टी चतुर्थियां व्यक्ति को यह अवसर देती हैं कि वह हर महीने अपने जीवन की बाधाओं, मानसिक अशांति और असंतुलन पर विजय पाने का संकल्प ले सके। भगवान गणेश की उपासना के माध्यम से यह व्रत विवेक, धैर्य और सकारात्मक सोच को मजबूत करता है।

इस लेख में संकष्टी चतुर्थी 2026 की महीने-वार जानकारी, धार्मिक महत्व, अंगारकी संकष्टी का विशेष प्रभाव, व्रत विधि, आहार नियम और सामान्य गलतियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि पाठक को यह समझाना है कि व्रत का वास्तविक अर्थ आत्मसंयम और सही आचरण में निहित है।

आज के तनावपूर्ण जीवन में संकष्टी चतुर्थी जैसे व्रत व्यक्ति को रुककर सोचने, आत्ममंथन करने और अपने कर्मों को सुधारने का अवसर देते हैं। यह व्रत यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और श्रद्धा बनाए रखी जाए, क्योंकि हर बाधा का समाधान संभव है।

यदि संकष्टी चतुर्थी 2026 को सही समझ और श्रद्धा के साथ अपनाया जाए, तो यह न केवल धार्मिक लाभ प्रदान करती है, बल्कि मानसिक शांति, पारिवारिक संतुलन और जीवन में स्पष्टता भी लाती है। यही इस व्रत का वास्तविक उद्देश्य और सार है।

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