एकादशी 2026 कैलेंडर देखें। 2026 की सभी 24 एकादशी की तिथि, वार, पारण समय और व्रत विधि की पूरी जानकारी यहां पढ़ें।

2026 में एकादशी कब-कब है?
हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में कुल 24 एकादशी आएंगी। प्रत्येक चंद्र मास में दो एकादशी होती हैं — एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और इसे भक्ति, संयम तथा आत्मशुद्धि का पवित्र साधन कहा गया है।
वर्ष 2026 की पहली एकादशी 14 जनवरी (षटतिला एकादशी) को पड़ेगी, जबकि वर्ष की अंतिम एकादशी 20 दिसंबर (मोक्षदा / वैकुंठ एकादशी) को आएगी। भक्तजन इन तिथियों पर भगवान विष्णु की पूजा, उपवास और दान-पुण्य करके आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
इस लेख में 2026 की सभी एकादशी की तिथि, वार, पारण समय, व्रत विधि और आहार नियम को पंचांग अनुसार सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया गया है, ताकि श्रद्धालु सही तिथि पर व्रत का पालन कर सकें।
इस लेख में क्या जानकारी मिलेगी
- 2026 की सभी 24 एकादशी की सूची
- प्रत्येक एकादशी की सही तिथि और वार
- एकादशी व्रत का महत्व
- व्रत रखने की सरल विधि
- पारण का सही समय और नियम
- व्रत में क्या खाएं और क्या न खाएं
Table of Contents
एकादशी 2026 कैलेंडर (सभी 24 एकादशी की तिथि)
हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में कुल 24 एकादशी आएंगी। प्रत्येक चंद्र मास में दो एकादशी होती हैं — एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष में। नीचे 2026 की सभी एकादशी की सही तिथि और वार क्रमबद्ध रूप में दिए गए हैं।
| क्रम | एकादशी का नाम | तिथि | वार |
|---|---|---|---|
| 1 | षटतिला एकादशी | 14 जनवरी 2026 | बुधवार |
| 2 | जया एकादशी | 29 जनवरी 2026 | गुरुवार |
| 3 | विजया एकादशी | 13 फरवरी 2026 | शुक्रवार |
| 4 | आमलकी एकादशी | 27 फरवरी 2026 | शुक्रवार |
| 5 | पापमोचनी एकादशी | 15 मार्च 2026 | रविवार |
| 6 | कामदा एकादशी | 28 मार्च 2026 | शनिवार |
| 7 | वरुथिनी एकादशी | 13 अप्रैल 2026 | सोमवार |
| 8 | मोहिनी एकादशी | 27 अप्रैल 2026 | सोमवार |
| 9 | अपरा एकादशी | 13 मई 2026 | बुधवार |
| 10 | पद्मिनी एकादशी | 27 मई 2026 | बुधवार |
| 11 | परमा एकादशी | 11 जून 2026 | गुरुवार |
| 12 | निर्जला एकादशी | 25 जून 2026 | गुरुवार |
| 13 | योगिनी एकादशी | 10 जुलाई 2026 | शुक्रवार |
| 14 | देवशयनी एकादशी | 24 जुलाई 2026 | शुक्रवार |
| 15 | कामिका एकादशी | 8 अगस्त 2026 | शनिवार |
| 16 | श्रावण पुत्रदा एकादशी | 23 अगस्त 2026 | रविवार |
| 17 | अजा एकादशी | 7 सितंबर 2026 | सोमवार |
| 18 | पार्श्व / परिवर्तिनी एकादशी | 22 सितंबर 2026 | मंगलवार |
| 19 | इंदिरा एकादशी | 6 अक्टूबर 2026 | मंगलवार |
| 20 | पापांकुशा एकादशी | 21 अक्टूबर 2026 | बुधवार |
| 21 | रमा एकादशी | 5 नवंबर 2026 | गुरुवार |
| 22 | देवउठनी / प्रबोधिनी एकादशी | 20 नवंबर 2026 | शुक्रवार |
| 23 | उत्पन्ना एकादशी | 4 दिसंबर 2026 | शुक्रवार |
| 24 | मोक्षदा / वैकुंठ एकादशी | 20 दिसंबर 2026 | रविवार |
महत्वपूर्ण जानकारी
इन 24 एकादशियों में कुछ तिथियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध मानी जाती हैं, जैसे:
- निर्जला एकादशी – सभी एकादशियों में सबसे कठिन और फलदायी
- देवशयनी एकादशी – चातुर्मास की शुरुआत
- देवउठनी एकादशी – भगवान विष्णु के जागरण का दिन
- मोक्षदा / वैकुंठ एकादशी – मोक्ष प्रदान करने वाली तिथि
इन दिनों भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व बताया गया है।
एकादशी का अर्थ और धार्मिक महत्व
हिन्दू धर्म में एकादशी को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी तिथि माना जाता है। पंचांग के अनुसार प्रत्येक चंद्र मास के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहा जाता है। इस प्रकार सामान्यतः एक वर्ष में लगभग 24 एकादशी आती हैं। यह व्रत विशेष रूप से भगवान विष्णु की भक्ति से जुड़ा हुआ है और इसे आत्मशुद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं है, बल्कि यह संयम, साधना और आत्मनियंत्रण का अवसर भी है। इस दिन भक्तजन अन्न का त्याग करके फलाहार या उपवास रखते हैं, भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और भजन-कीर्तन या मंत्र जप में समय बिताते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और मन में शांति तथा सकारात्मकता का विकास होता है।
पुराणों में एकादशी के महत्व का विशेष वर्णन मिलता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा और जीवों के कल्याण के लिए एक दिव्य शक्ति उत्पन्न की, जिसे एकादशी देवी कहा गया। तभी से यह तिथि पापों का नाश करने वाली और मोक्ष प्रदान करने वाली मानी जाती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से एकादशी का व्रत मन को अनुशासित करने का अभ्यास भी माना जाता है। जब व्यक्ति भोजन, इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखता है, तो उसका मन अधिक शांत और एकाग्र हो जाता है। इसलिए कई संत और आचार्य एकादशी को भक्ति और आत्मचिंतन का विशेष दिन मानते हैं।
इस प्रकार एकादशी व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह जीवन में संयम, संतुलन और आध्यात्मिक जागरूकता लाने का मार्ग भी है।
एकादशी व्रत क्यों रखा जाता है?
एकादशी व्रत रखने के पीछे धार्मिक, आध्यात्मिक और व्यवहारिक तीनों प्रकार के कारण बताए गए हैं। हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार यह व्रत भगवान विष्णु की भक्ति का विशेष माध्यम माना जाता है। श्रद्धा और नियम के साथ किया गया एकादशी व्रत मनुष्य के पापों को नष्ट करने वाला और पुण्य प्रदान करने वाला बताया गया है।
पुराणों में एक प्रसिद्ध कथा मिलती है कि जब पाप नामक दैत्य ने तीनों लोकों में अत्याचार फैलाया, तब भगवान विष्णु ने अपने तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट की। उस शक्ति ने दैत्य का नाश किया और उसी दिन को एकादशी तिथि के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इसी कारण से एकादशी को पाप नाश करने वाली तिथि माना जाता है।
धार्मिक दृष्टि से यह व्रत मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने का अभ्यास भी माना जाता है। सामान्य दिनों में व्यक्ति भोजन, इच्छाओं और भोगों में उलझा रहता है, लेकिन एकादशी के दिन संयम और साधना का पालन करने से मन शांत और एकाग्र होता है। यही कारण है कि इस दिन जप, ध्यान, भजन और भगवान विष्णु का स्मरण विशेष फलदायी माना जाता है।
व्यवहारिक दृष्टि से भी एकादशी व्रत का महत्व बताया जाता है। महीने में दो बार हल्का या सीमित भोजन करने से शरीर को विश्राम मिलता है। आयुर्वेद में भी समय-समय पर उपवास को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना गया है। इस प्रकार एकादशी व्रत केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक संतुलन बनाए रखने का भी एक माध्यम है।
इसलिए भारत के अनेक परिवारों में एकादशी को विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन घरों में भगवान विष्णु की पूजा, कथा-श्रवण, दान और सात्विक आहार का पालन किया जाता है।
एकादशी तिथि कैसे निर्धारित होती है? (पंचांग समझें)
हिन्दू पंचांग में तिथियों की गणना सूर्य और चन्द्रमा की गति के आधार पर की जाती है। सरल शब्दों में, जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच की कोणीय दूरी एक निश्चित स्तर तक पहुँचती है, तब एक नई तिथि का आरंभ होता है। इसी गणना के अनुसार प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहा जाता है।
पंचांग में एक मास दो पक्षों में विभाजित होता है — कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। अमावस्या के बाद शुरू होने वाले पक्ष को शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा के बाद शुरू होने वाले पक्ष को कृष्ण पक्ष कहा जाता है। इन दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि पर आने वाला दिन ही एकादशी कहलाता है। इस कारण सामान्यतः हर महीने दो एकादशी होती हैं।
एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हिन्दू पंचांग की तिथि केवल कैलेंडर की तारीख से निर्धारित नहीं होती। तिथि का आरंभ और समाप्ति घड़ी के समय से होती है। इसलिए कई बार एकादशी तिथि एक दिन की रात से शुरू होकर अगले दिन तक चल सकती है। ऐसे में व्रत किस दिन रखा जाए, इसका निर्णय सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि के आधार पर किया जाता है। इसे “उदय तिथि का नियम” कहा जाता है।
कुछ परंपराओं में स्मार्त और वैष्णव एकादशी के पालन में हल्का अंतर भी देखने को मिलता है। वैष्णव परंपरा में कभी-कभी एकादशी का व्रत एक दिन बाद भी रखा जाता है, यदि तिथि का संयोग विशेष प्रकार से बनता है। इसलिए कई भक्त स्थानीय पंचांग या विश्वसनीय ज्योतिष स्रोत के अनुसार व्रत का दिन निर्धारित करते हैं।
इस प्रकार एकादशी तिथि का निर्धारण खगोलीय गणना और पंचांग के नियमों के आधार पर किया जाता है। सही तिथि जानकर व्रत करना ही शास्त्रों के अनुसार उचित और फलदायी माना जाता है।
एकादशी पारण क्या है? (सही समय और नियम)
एकादशी व्रत का समापन जिस विधि से किया जाता है उसे पारण कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी का व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसका सही समय पर पारण करना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है। यदि व्रत के बाद उचित समय पर पारण न किया जाए, तो व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता — ऐसा धर्मग्रंथों में बताया गया है।
एकादशी के अगले दिन आने वाली तिथि को द्वादशी कहा जाता है। सामान्य नियम के अनुसार व्रत का पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाता है। कई पंचांगों में पारण के लिए एक निश्चित समय-सीमा दी जाती है, जिसे पारण मुहूर्त कहा जाता है। इस समय के भीतर व्रत खोलना शुभ और शास्त्रसम्मत माना जाता है।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में पंचांग के अनुसार एकादशी के दिन ही निर्धारित समय में पारण करने का निर्देश दिया जाता है। इसी कारण प्रत्येक एकादशी का पारण समय अलग-अलग हो सकता है।
पारण करते समय भोजन की शुरुआत हल्के और सात्विक आहार से करनी चाहिए। परंपरा के अनुसार पहले जल, फल या दूध ग्रहण किया जाता है, उसके बाद सामान्य भोजन लिया जाता है। पारण के समय अत्यधिक या भारी भोजन करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि पूरे दिन उपवास के बाद शरीर को धीरे-धीरे सामान्य आहार की ओर लाना चाहिए।
धार्मिक दृष्टि से पारण का पालन करना व्रत की मर्यादा बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है। इसलिए जो भी व्यक्ति एकादशी का व्रत रखता है, उसे पंचांग देखकर सही समय पर पारण करना चाहिए। यही विधि शास्त्रों में एकादशी व्रत को पूर्ण और फलदायी बनाती है।
एकादशी व्रत विधि (सरल और शास्त्रसम्मत)

एकादशी व्रत की विधि सरल मानी जाती है, लेकिन इसमें श्रद्धा, संयम और नियम का विशेष महत्व होता है। इस व्रत का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म को पवित्र रखना भी है। इसलिए व्रत की शुरुआत एकादशी से एक दिन पहले, अर्थात दशमी तिथि से ही मानी जाती है।
दशमी के दिन सायंकाल हल्का और सात्विक भोजन करना उचित माना जाता है। तामसिक भोजन, मांसाहार और अत्यधिक मसालेदार पदार्थों से बचना चाहिए। इससे अगले दिन उपवास करना आसान होता है और शरीर पर अधिक भार नहीं पड़ता।
एकादशी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा-स्थान में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर दीपक जलाएं, धूप अर्पित करें और तुलसी दल चढ़ाएं। इसके बाद भगवान विष्णु के मंत्रों का जप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ या गीता के श्लोकों का स्मरण करना शुभ माना जाता है।
व्रत रखने का तरीका व्यक्ति की क्षमता के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। कुछ लोग निर्जल उपवास रखते हैं, जबकि कई लोग फलाहार, दूध या हल्का सात्विक आहार ग्रहण करते हैं। मुख्य बात यह है कि इस दिन अनाज का त्याग किया जाए और मन को भक्ति में लगाया जाए।
दिनभर यथासंभव भगवान का स्मरण, भजन-कीर्तन या धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना लाभकारी माना जाता है। क्रोध, निंदा, असत्य और नकारात्मक विचारों से दूर रहना भी व्रत का महत्वपूर्ण नियम है।
अगले दिन द्वादशी तिथि में निर्धारित पारण समय पर व्रत का समापन किया जाता है। पारण के समय पहले जल या फल ग्रहण कर व्रत खोला जाता है, उसके बाद सामान्य भोजन किया जाता है। इस प्रकार नियम और श्रद्धा के साथ किया गया एकादशी व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
एकादशी व्रत में क्या खाएं और क्या न खाएं
एकादशी व्रत में भोजन के नियमों का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन सामान्य अनाज का सेवन नहीं किया जाता। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को हल्का रखना और मन को भक्ति तथा साधना में लगाना होता है। इसलिए व्रत के दौरान सात्विक और हल्का आहार लेने की सलाह दी जाती है।
1️⃣ व्रत में क्या खाएं
एकादशी के दिन निम्न प्रकार के खाद्य पदार्थ सामान्यतः स्वीकार्य माने जाते हैं:
- ताजे फल (केला, सेब, पपीता, अनार आदि)
- दूध, दही और छाछ
- साबूदाना से बने व्यंजन
- कुट्टू के आटे या सिंघाड़े के आटे से बने पकवान
- उबले हुए आलू या शकरकंद
- मूंगफली, काजू और बादाम (सीमित मात्रा में)
- सेंधा नमक का उपयोग
ये सभी पदार्थ हल्के और सात्विक माने जाते हैं, इसलिए व्रत के दौरान ऊर्जा बनाए रखने में सहायक होते हैं।
2️⃣ व्रत में क्या न खाएं
एकादशी के दिन निम्न खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए:
- चावल और चावल से बने व्यंजन
- गेहूं और उससे बने आहार
- सभी प्रकार की दालें
- सामान्य नमक
- मांस, मछली, अंडा और मदिरा
- अत्यधिक मसालेदार या तामसिक भोजन
धार्मिक मान्यता है कि इन पदार्थों का सेवन व्रत की शुद्धता को प्रभावित करता है, इसलिए इनसे परहेज करना उचित माना जाता है।
3️⃣ संतुलन और संयम का महत्व
व्रत के दौरान भोजन का उद्देश्य स्वाद नहीं, बल्कि शरीर को आवश्यक ऊर्जा देना होता है। इसलिए अत्यधिक मात्रा में भोजन करना उचित नहीं माना जाता। जो लोग पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, वे फलाहार या दूध के साथ व्रत रख सकते हैं।
इस प्रकार संयम और सात्विक आहार के साथ किया गया एकादशी व्रत शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी माना जाता है।
प्रमुख एकादशी और उनका विशेष महत्व
हिन्दू पंचांग में वर्ष भर आने वाली सभी एकादशियों का अपना अलग महत्व बताया गया है। हालांकि इनमें से कुछ एकादशी विशेष रूप से अधिक प्रसिद्ध और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन तिथियों पर श्रद्धालु विशेष पूजा, व्रत और दान-पुण्य करते हैं। नीचे कुछ प्रमुख एकादशियों का संक्षिप्त महत्व बताया गया है।
1️⃣ निर्जला एकादशी
निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे कठिन और सबसे फलदायी माना जाता है। इस दिन व्रती जल तक ग्रहण नहीं करते, इसलिए इसे “निर्जला” कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा से करता है, उसे वर्ष भर की सभी एकादशियों के व्रत के समान फल प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ जल और वस्त्र का दान करना भी शुभ माना जाता है।
2️⃣ देवशयनी एकादशी
देवशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और चातुर्मास की शुरुआत होती है। इस अवधि में विवाह और अन्य शुभ कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। भक्तजन इस दिन भगवान विष्णु की पूजा कर आध्यात्मिक साधना का संकल्प लेते हैं।
3️⃣ देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी
देवउठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में आती है। इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन से विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ कार्य पुनः आरंभ होते हैं। कई स्थानों पर इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है।
4️⃣ मोक्षदा / वैकुंठ एकादशी
मोक्षदा या वैकुंठ एकादशी को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। दक्षिण भारत में इसे वैकुंठ एकादशी के रूप में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है, जब मंदिरों में वैकुंठ द्वार खोले जाते हैं और भक्त दर्शन के लिए बड़ी संख्या में पहुँचते हैं।
एकादशी व्रत में होने वाली सामान्य गलतियाँ
एकादशी व्रत श्रद्धा और नियम के साथ किया जाना चाहिए। लेकिन कई बार जानकारी के अभाव या गलत धारणाओं के कारण लोग कुछ ऐसी भूलें कर बैठते हैं, जिससे व्रत की मर्यादा प्रभावित हो सकती है। इसलिए एकादशी व्रत करते समय कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।
1️⃣ बिना पंचांग देखे व्रत रखना
सबसे सामान्य गलती यह होती है कि लोग केवल सामान्य कैलेंडर या सोशल मीडिया की जानकारी के आधार पर व्रत रख लेते हैं। जबकि एकादशी तिथि का निर्धारण चंद्र गणना और पंचांग के आधार पर होता है। इसलिए व्रत का दिन हमेशा विश्वसनीय पंचांग देखकर ही तय करना चाहिए।
2️⃣ पारण का सही समय न मानना
कई लोग एकादशी का व्रत तो रखते हैं, लेकिन अगले दिन पारण का सही समय नहीं देखते। शास्त्रों के अनुसार व्रत का पारण द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर करना आवश्यक माना गया है। यदि पारण सही समय पर न किया जाए तो व्रत अधूरा माना जा सकता है।
3️⃣ व्रत को केवल उपवास समझना
कुछ लोग यह मान लेते हैं कि एकादशी व्रत का अर्थ केवल भूखा रहना है। जबकि शास्त्रों में स्पष्ट बताया गया है कि इस दिन मन, वाणी और व्यवहार में भी संयम रखना चाहिए। क्रोध, निंदा, असत्य और नकारात्मक विचारों से बचना भी व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
4️⃣ पारण के बाद अत्यधिक भोजन करना
पूरे दिन उपवास के बाद अचानक बहुत अधिक भोजन करना शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिए पारण करते समय पहले हल्का और सात्विक भोजन लेना चाहिए। धीरे-धीरे सामान्य आहार पर लौटना शरीर के लिए अधिक उचित माना जाता है।
5️⃣ स्वास्थ्य की अनदेखी करना
कुछ लोग अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक कठोर व्रत रखने का प्रयास करते हैं, जैसे निर्जला व्रत, जबकि उनका स्वास्थ्य इसकी अनुमति नहीं देता। शास्त्रों में भी कहा गया है कि व्रत विवेक और क्षमता के अनुसार करना चाहिए। यदि स्वास्थ्य समस्या हो तो फलाहार या हल्का उपवास करना अधिक उचित होता है।
निर्जला एकादशी के विशेष नियम
निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे कठिन माना जाता है। इस दिन जल तक ग्रहण नहीं किया जाता, इसलिए इसे निर्जला कहा गया है। यह व्रत केवल स्वस्थ व्यक्ति को ही रखना चाहिए। वृद्ध, गर्भवती महिलाएँ, बच्चे और बीमार व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण रूप से न रखें — यह शास्त्रसम्मत और व्यवहारिक दोनों दृष्टि से उचित माना गया है।
निर्जला एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को एक दिन पहले ही शरीर और मन की तैयारी कर लेनी चाहिए। दशमी की रात हल्का भोजन करें और अधिक नमक या मसाले से बचें। एकादशी के दिन सुबह पूजा कर व्रत का संकल्प लें। दिनभर धूप, अधिक श्रम और क्रोध से बचना चाहिए।
इस दिन जल दान का विशेष महत्व बताया गया है। घड़ा, मटका, पानी, पंखा और छाया का दान पुण्यकारी माना जाता है। जो लोग निर्जला व्रत नहीं रख सकते, वे जल के साथ व्रत कर सकते हैं और दान-पुण्य से उसका फल प्राप्त कर सकते हैं।
निर्जला एकादशी यह सिखाती है कि त्याग और संयम से आत्मबल बढ़ता है। परंतु स्वास्थ्य से बढ़कर कोई व्रत नहीं होता। इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार ही व्रत करना श्रेष्ठ माना गया है। पारण अगले दिन द्वादशी में उचित समय पर करना अनिवार्य है।
महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग एकादशी व्रत कैसे रखें
एकादशी व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन और आत्मा को शुद्ध करना है। शास्त्रों में भी स्पष्ट कहा गया है कि धर्म विवेक और करुणा के साथ किया जाना चाहिए। इसलिए महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए व्रत के नियमों में सरलता और संतुलन आवश्यक माना गया है।
महिलाएं यदि गर्भवती हों या स्वास्थ्य संबंधी समस्या हो, तो कठोर उपवास न करें। वे फलाहार, दूध या हल्का सात्विक भोजन लेकर व्रत कर सकती हैं। कई परंपराओं में मासिक धर्म के समय व्रत न रखने की मान्यता है। ऐसे समय केवल भगवान विष्णु का स्मरण, नाम-जप और मानसिक श्रद्धा को ही पर्याप्त माना गया है।
बच्चों के लिए पूर्ण उपवास उचित नहीं माना जाता। छोटे बच्चे अनाज का त्याग कर फल या दूध ले सकते हैं। इससे उनमें धार्मिक संस्कार विकसित होते हैं और शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। बच्चों को व्रत का महत्व प्रेम और सरल शब्दों में समझाना चाहिए, ताकि धर्म भय नहीं, बल्कि श्रद्धा का विषय बने।
बुजुर्गों को अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही व्रत रखना चाहिए। यदि दवा या नियमित भोजन आवश्यक हो, तो केवल अनाज का त्याग कर पूजा-पाठ और दान करें। शास्त्रों में स्पष्ट है कि स्वास्थ्य से बढ़कर कोई व्रत नहीं होता।
इस प्रकार महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए एकादशी व्रत आत्मिक श्रद्धा के साथ, शरीर की सीमा को समझते हुए करना ही श्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत माना गया है।
एकादशी व्रत के आध्यात्मिक और स्वास्थ्य लाभ
एकादशी व्रत को हिन्दू धर्म में केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि आत्मिक और शारीरिक संतुलन का साधन भी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन उपवास करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से एकादशी व्रत मन को शांत और एकाग्र बनाने में सहायक माना जाता है। जब व्यक्ति भोजन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है, तो उसका मन भक्ति और ध्यान में अधिक स्थिर हो जाता है। इसी कारण कई संत और साधक एकादशी को साधना का विशेष दिन मानते हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से भी समय-समय पर उपवास करना लाभकारी माना गया है। हल्का भोजन या फलाहार करने से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है और शरीर की शुद्धि होती है। आयुर्वेद में भी नियंत्रित उपवास को स्वास्थ्य के लिए उपयोगी बताया गया है।
इस प्रकार एकादशी व्रत धार्मिक आस्था के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक संतुलन बनाए रखने का भी एक प्रभावी माध्यम माना जाता है।
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❓ एकादशी 2026 से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: एकादशी 2026 में कुल कितनी एकादशी होंगी?
उत्तर: वर्ष 2026 में हिन्दू पंचांग के अनुसार कुल 24 एकादशी होंगी। प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में एक-एक एकादशी आती है। कुछ वर्षों में अधिक मास होने पर एकादशी की संख्या बढ़ सकती है, लेकिन 2026 में सामान्य स्थिति है। इन 24 एकादशियों में कुछ विशेष एकादशी जैसे निर्जला, देवउठनी और मोक्षदा को अधिक महत्व दिया गया है। सभी एकादशी का व्रत समान नियमों के साथ रखा जाता है, लेकिन कुछ के नियम विशेष होते हैं।
प्रश्न 2: एकादशी का व्रत क्यों रखा जाता है?
उत्तर: एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत से पापों का नाश होता है और मन शुद्ध होता है। एकादशी केवल उपवास नहीं, बल्कि संयम और आत्मनियंत्रण का अभ्यास है। इस दिन सात्विक भोजन, पूजा और दान करने से मानसिक शांति मिलती है। शास्त्रों में एकादशी को मोक्ष प्राप्ति का साधन भी बताया गया है, इसलिए इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
प्रश्न 3: एकादशी व्रत में क्या खाना चाहिए?
उत्तर: एकादशी व्रत में सामान्यतः अनाज का त्याग किया जाता है। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक व्रत में स्वीकार्य माने जाते हैं। भोजन हल्का और सात्विक होना चाहिए। व्रत का उद्देश्य स्वाद नहीं, बल्कि शरीर को आवश्यक ऊर्जा देना होता है। जो लोग पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, वे फलाहार के साथ व्रत कर सकते हैं।
प्रश्न 4: एकादशी पर क्या नहीं खाना चाहिए?
उत्तर: एकादशी के दिन चावल, गेहूं, दालें और उनसे बने सभी खाद्य पदार्थ वर्जित माने जाते हैं। साधारण नमक, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन भी नहीं लेना चाहिए। अत्यधिक तला-भुना या मसालेदार भोजन व्रत की भावना के विरुद्ध माना जाता है। इन नियमों का पालन करने से व्रत शुद्ध और फलदायी होता है।
प्रश्न 5: एकादशी पारण क्या होता है?
उत्तर: पारण का अर्थ है व्रत का समापन। एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में किया जाता है। पारण का सही समय पंचांग देखकर ही तय करना चाहिए। बिना पारण किए व्रत अधूरा माना जाता है। पारण हमेशा हल्के और सात्विक भोजन से करना चाहिए, ताकि शरीर पर अचानक बोझ न पड़े।
प्रश्न 6: निर्जला एकादशी क्या है और इसे कौन रख सकता है?
उत्तर: निर्जला एकादशी सबसे कठिन मानी जाती है, क्योंकि इसमें जल तक ग्रहण नहीं किया जाता। यह व्रत केवल स्वस्थ व्यक्ति को ही रखना चाहिए। वृद्ध, गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग निर्जला व्रत न रखें। धार्मिक मान्यता है कि इस एक व्रत से वर्ष की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है।
प्रश्न 7: एकादशी व्रत से क्या लाभ होते हैं?
उत्तर: एकादशी व्रत से मानसिक शांति, आत्मनियंत्रण और सकारात्मकता मिलती है। धार्मिक दृष्टि से इसे पाप नाश और पुण्य प्राप्ति का साधन माना गया है। व्यवहारिक रूप से यह शरीर को विश्राम देता है और अनुशासन सिखाता है। श्रद्धा के साथ किया गया एकादशी व्रत जीवन में संतुलन लाता है।
निष्कर्ष
एकादशी व्रत हिन्दू धर्म की एक महत्वपूर्ण और पवित्र परंपरा है। यह व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि संयम, श्रद्धा और आत्मशुद्धि का मार्ग है। वर्ष 2026 में आने वाली सभी 24 एकादशियाँ अपने-अपने महत्व और फल के कारण विशेष हैं।
इस लेख में एकादशी 2026 की सम्पूर्ण सूची, सही तिथियाँ, पारण समय, व्रत विधि और आहार नियमों को पंचांग अनुसार सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठकों को किसी प्रकार का भ्रम न रहे।
यदि कोई व्यक्ति पूरे वर्ष सभी एकादशी नहीं रख सकता, तो भी वह निर्जला, देवउठनी और मोक्षदा जैसी प्रमुख एकादशियों का व्रत रखकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है। वहीं, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग अपनी क्षमता के अनुसार सरल नियम अपनाकर व्रत कर सकते हैं।
एकादशी व्रत का वास्तविक उद्देश्य मन को शुद्ध करना और जीवन में संतुलन लाना है। श्रद्धा, सही जानकारी और विवेक के साथ किया गया व्रत निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम देता है।

Suman Kumar भारतीय संस्कृति, धर्म, व्रत-त्योहार और सनातन परंपराओं पर शोध आधारित लेख लिखते हैं।
SanskritiSaar के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान को सरल हिंदी में प्रस्तुत करते हैं।


