रथ सप्तमी 2026 सूर्य देव को समर्पित एक पवित्र पर्व है, जिसे सूर्य जयंती के रूप में भी जाना जाता है। यह पर्व माघ मास की शुक्ल सप्तमी को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में रथ सप्तमी रविवार, 25 जनवरी 2026 को है। इस दिन सूर्य पूजा, पवित्र स्नान और दान-पुण्य करने से स्वास्थ्य, ऊर्जा और सकारात्मकता की प्राप्ति मानी जाती है।

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भूमिका (Introduction)
भारतीय संस्कृति में सूर्य को केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना गया है। प्रकाश, ऊष्मा, समय और ऊर्जा—ये सभी सूर्य से ही जुड़े हैं। रथ सप्तमी उसी जीवनदायी शक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि जिस तरह सूर्य हर दिन बिना रुके अपना कार्य करता है, उसी तरह मनुष्य को भी अनुशासन और निरंतरता के साथ जीवन जीना चाहिए।
आज के समय में, जब जीवनशैली असंतुलित होती जा रही है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बढ़ रही हैं, रथ सप्तमी का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और प्रकृति के साथ तालमेल का संदेश देता है। सुबह-सुबह सूर्य को अर्घ्य देना, स्नान करना और दिन की शुरुआत सकारात्मक भाव से करना—ये सभी आदतें आज भी उतनी ही उपयोगी हैं।
रथ सप्तमी का वातावरण अपने आप में अलग होता है। उगते सूर्य की लालिमा, ठंडी सुबह, जल से भरे कलश और श्रद्धालुओं की शांत उपस्थिति—ये सब मिलकर इस दिन को विशेष बना देते हैं।
रथ सप्तमी 2026 क्या है?
रथ सप्तमी वह पर्व है जो सूर्य देव के रथ के उत्तरायण मार्ग पर चलने का प्रतीक माना जाता है। “रथ” का अर्थ है वाहन और “सप्तमी” का अर्थ है सातवीं तिथि। मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव अपने रथ पर सवार होकर पूरे संसार को प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करते हैं।
इसी कारण इसे सूर्य जयंती भी कहा जाता है। कुछ परंपराओं में इसे सूर्य के प्रकट होने का दिन माना गया है। इस दिन सूर्य पूजा करने से शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति की कामना की जाती है।
रथ सप्तमी का अर्थ केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यह दिन हमें यह समझाता है कि प्रकृति के नियमों के साथ तालमेल बिठाकर जीवन जीना ही संतुलन का मार्ग है।
रथ सप्तमी 2026 कब है? (तिथि और वार)
रथ सप्तमी 2026
📅 रविवार, 25 जनवरी 2026
यह तिथि माघ मास की शुक्ल सप्तमी को पड़ रही है। पंचांग के अनुसार इसी दिन सूर्य पूजा और रथ सप्तमी के सभी प्रमुख अनुष्ठान किए जाते हैं।
रथ सप्तमी का शुभ मुहूर्त
रथ सप्तमी पर सूर्य पूजा के लिए सूर्योदय का समय सबसे शुभ माना जाता है। प्रातःकाल सूर्य को अर्घ्य देना इस पर्व का मुख्य कर्म है।
आमतौर पर पूजा का श्रेष्ठ समय:
- सूर्योदय से लेकर सुबह के कुछ घंटे
इस समय वातावरण शांत होता है और सूर्य की किरणें स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी मानी जाती हैं। यही कारण है कि रथ सप्तमी को स्वास्थ्य से जुड़ा पर्व भी कहा जाता है।
रथ सप्तमी 2026 की संपूर्ण पूजा विधि (घर और मंदिर – दोनों के लिए)
रथ सप्तमी की पूजा विधि सरल है, लेकिन इसका प्रभाव गहरा माना जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और दिनचर्या को अनुशासित बनाना है। पूजा की शुरुआत प्रातःकाल से ही होती है, क्योंकि सूर्य उपासना में सूर्योदय का समय सबसे अधिक शुभ माना गया है। सुबह उठकर स्नान करना, स्वच्छ वस्त्र पहनना और मन को शांत रखना—यही इस पूजा की पहली तैयारी है।
स्नान के बाद खुले स्थान में या छत पर खड़े होकर उगते सूर्य को जल अर्पित किया जाता है। जल में लाल फूल, अक्षत या थोड़ा सा तिल मिलाना कई जगहों पर प्रचलित है। जल अर्पण करते समय मन में स्वास्थ्य, ऊर्जा और सकारात्मक सोच की कामना की जाती है। यह कोई जटिल अनुष्ठान नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की जीवनशैली में अनुशासन जोड़ने का अभ्यास है।
घर में पूजा करते समय सूर्य देव के चित्र या प्रतीक के सामने दीपक जलाया जाता है। गुड़, तिल और मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं। कुछ परिवारों में सूर्य मंत्रों का जप किया जाता है, जबकि कई लोग केवल मौन और ध्यान के साथ सूर्य को नमन करते हैं। मंदिरों में सामूहिक रूप से सूर्य पूजा और अर्घ्य देने की परंपरा भी देखी जाती है, जो समाज में एकता और सकारात्मकता का भाव बढ़ाती है।
रथ सप्तमी पर पवित्र स्नान का महत्व
रथ सप्तमी की शुरुआत पवित्र स्नान से की जाती है। कई जगहों पर लोग तिल, दूर्वा या अरक (आक/मदार) के पत्ते सिर पर रखकर स्नान करते हैं। इसका उद्देश्य शरीर और मन—दोनों की शुद्धि माना जाता है।
स्नान केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह दिनचर्या को अनुशासित करने का अभ्यास भी है। ठंड के मौसम में सुबह स्नान करना शरीर को सक्रिय करता है और आलस्य दूर करता है।
यदि नदी में स्नान संभव न हो, तो घर पर स्वच्छ जल से स्नान करना भी पर्याप्त माना जाता है। मुख्य बात है—भाव और श्रद्धा।
सूर्य पूजा का अर्थ और महत्व
सूर्य पूजा का अर्थ केवल मंत्र पढ़ना या जल चढ़ाना नहीं है। यह प्रकृति की उस शक्ति के प्रति सम्मान है, जो बिना किसी भेदभाव के सभी को समान रूप से ऊर्जा देती है।
सूर्य पूजा हमें समय का महत्व सिखाती है। सूर्य हर दिन समय पर उदय और अस्त होता है। यही अनुशासन मानव जीवन के लिए भी आवश्यक है। रथ सप्तमी इस अनुशासन का उत्सव है।
रथ सप्तमी से जुड़ी पौराणिक कथाएँ और उनका अर्थ
रथ सप्तमी के पीछे जुड़ी कथाएँ सूर्य उपासना की गहराई को समझाती हैं। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, इसी दिन सूर्य देव अपने सप्त अश्वों वाले रथ पर आरूढ़ होकर उत्तरायण पथ पर तेज़ी से आगे बढ़ते हैं। सप्त अश्व सप्ताह के सात दिनों और मानव जीवन की सात ऊर्जाओं का प्रतीक माने जाते हैं। कथा का सार यह है कि सूर्य केवल प्रकाश नहीं देते, बल्कि समय, गति और जीवन-चक्र को भी संचालित करते हैं।
एक अन्य कथा में राजा यशोवर्मा का उल्लेख मिलता है, जिनके पुत्र को असाध्य रोग था। ऋषियों के निर्देश पर राजा ने माघ शुक्ल सप्तमी को सूर्य पूजा, अर्घ्य और दान किया। मान्यता है कि इस साधना से रोग से मुक्ति मिली। यह कथा बताती है कि रथ सप्तमी को स्वास्थ्य-लाभ से जोड़ने की परंपरा केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि अनुभवजन्य विश्वास पर आधारित है।
इन कथाओं का उद्देश्य चमत्कार दिखाना नहीं, बल्कि यह समझाना है कि अनुशासन, नियमितता और प्रकृति के साथ तालमेल से जीवन में संतुलन आता है। सूर्य की तरह समय पर उठना, कर्म करना और विश्राम लेना—यही रथ सप्तमी का मूल संदेश है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में रथ सप्तमी
भारत की विविधता रथ सप्तमी के पालन में भी दिखाई देती है। हर क्षेत्र में परंपराएँ अलग हैं, लेकिन केंद्र में सूर्य उपासना ही रहती है।
दक्षिण भारत में रथ सप्तमी विशेष उत्साह के साथ मनाई जाती है। तमिलनाडु और कर्नाटक में इसे सूर्य जयंती के रूप में भी जाना जाता है। कई घरों में अरक (आक/मदार) के पत्ते सिर पर रखकर स्नान करने की परंपरा है, जिसे शारीरिक शुद्धि और रोग-निवारण से जोड़ा जाता है।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मंदिरों में विशेष सूर्य पूजा और रथ-प्रतीकात्मक यात्राएँ आयोजित की जाती हैं। महिलाएँ रंगोली बनाकर सूर्य देव का स्वागत करती हैं।
उत्तर भारत में रथ सप्तमी अपेक्षाकृत शांत रूप में मनाई जाती है। लोग प्रातः स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते हैं और घरों में साधारण पूजा करते हैं। यहाँ इसका फोकस अनुशासन और स्वास्थ्य पर अधिक रहता है।
पूर्वी भारत में यह पर्व सूर्य उपासना और दान-पुण्य से जुड़ा है। इन विविध परंपराओं से स्पष्ट है कि भले ही रीति अलग हों, भावना एक ही है।
रथ सप्तमी और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
आयुर्वेद सूर्य को जीवन-ऊर्जा का मुख्य स्रोत मानता है। सुबह की धूप शरीर के लिए लाभकारी मानी जाती है, क्योंकि यह जठराग्नि को सक्रिय करती है और दिनचर्या को संतुलित बनाती है। रथ सप्तमी पर प्रातः सूर्य दर्शन और स्नान की परंपरा इसी आयुर्वेदिक सोच से जुड़ी है।
आयुर्वेद के अनुसार, माघ मास में कफ का प्रभाव बढ़ता है। ठंड के कारण आलस्य और जड़ता आती है। रथ सप्तमी पर सुबह उठकर स्नान, सूर्य दर्शन और हल्का उपवास शरीर को सक्रिय करता है और संतुलन बनाता है।
इस प्रकार रथ सप्तमी केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ऋतुचर्या का हिस्सा भी है, जो शरीर और मन—दोनों को स्वस्थ रखने में सहायक माना जाता है।
सूर्य नमस्कार और रथ सप्तमी
रथ सप्तमी के दिन सूर्य नमस्कार करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है। सूर्य नमस्कार केवल योगाभ्यास नहीं, बल्कि सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक शारीरिक माध्यम है।
इस दिन सूर्य नमस्कार करने से शरीर में लचीलापन आता है, रक्त संचार बेहतर होता है और मन में सकारात्मकता बढ़ती है। यही कारण है कि कई योगाचार्य रथ सप्तमी को सूर्य नमस्कार के अभ्यास के लिए विशेष दिन मानते हैं।
यह अभ्यास हमें यह सिखाता है कि पूजा केवल मंत्रों से नहीं, बल्कि कर्म और अनुशासन से भी होती है।
रथ सप्तमी पर दान-पुण्य का महत्व
रथ सप्तमी पर दान को विशेष पुण्यकारी माना गया है। दान का उद्देश्य केवल धार्मिक फल प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी है। इस दिन अन्न, गुड़, तिल, वस्त्र और जल का दान शुभ माना जाता है। ठंड के मौसम में जरूरतमंदों को गर्म कपड़े देना भी इस पर्व की भावना के अनुरूप माना जाता है।
दान हमें यह सिखाता है कि जीवन की ऊर्जा केवल लेने से नहीं, बल्कि बाँटने से बढ़ती है। सूर्य स्वयं इसका सबसे बड़ा उदाहरण है—वह बिना किसी भेदभाव के सभी को प्रकाश देता है। रथ सप्तमी का दान उसी भावना का विस्तार है।
आज के समय में रथ सप्तमी की प्रासंगिकता
आज का जीवन अनियमित दिनचर्या, देर से उठने और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है। रथ सप्तमी हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति की लय के साथ चलना ही स्वस्थ जीवन का आधार है। सुबह की धूप, समय पर भोजन और नियमित दिनचर्या—ये सभी बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
यह पर्व केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि जीवनशैली सुधारने का संकेत है। यदि कोई व्यक्ति रथ सप्तमी के संदेश को रोज़मर्रा की आदतों में शामिल कर ले, तो यह उसके स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
रथ सप्तमी से जुड़ी आम गलतफहमियाँ और सही दृष्टिकोण
एक आम गलतफहमी यह है कि रथ सप्तमी केवल दक्षिण भारत में मनाई जाती है। वास्तव में, सूर्य उपासना पूरे भारत में किसी न किसी रूप में प्रचलित है। क्षेत्रीय परंपराएँ भले ही अलग हों, लेकिन मूल भावना समान है।
दूसरी गलतफहमी यह है कि इस दिन कठिन उपवास या जटिल अनुष्ठान आवश्यक हैं। सच्चाई यह है कि श्रद्धा, समय पर उठना और सूर्य को अर्घ्य देना ही इस पर्व का सार है। जटिलता नहीं, बल्कि नियमितता और भावना इसका मूल तत्व है।
रथ सप्तमी 2026 का समग्र संदेश
रथ सप्तमी 2026 हमें यह सिखाती है कि जीवन में प्रकाश बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। सूर्य की तरह नियमित, अनुशासित और निस्वार्थ रहना ही इस पर्व का वास्तविक संदेश है। यह पर्व धर्म, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक जिम्मेदारी—चारों को एक साथ जोड़ता है।
यदि इस दिन की भावना को केवल एक दिन तक सीमित न रखकर जीवन में उतारा जाए, तो रथ सप्तमी एक स्थायी सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सकती है।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q 1: रथ सप्तमी 2026 कब है?
रथ सप्तमी 2026 रविवार, 25 जनवरी को मनाई जाएगी। यह माघ मास की शुक्ल सप्तमी तिथि है।
Q 2: रथ सप्तमी को सूर्य जयंती क्यों कहा जाता है?
मान्यता है कि इसी दिन सूर्य देव अपने रथ पर आरूढ़ होकर उत्तरायण मार्ग पर तेज़ होते हैं, इसलिए कई परंपराओं में इसे सूर्य जयंती कहा जाता है।
Q 3: रथ सप्तमी पर पूजा का सबसे शुभ समय क्या है?
रथ सप्तमी पर सूर्योदय का समय सबसे शुभ माना जाता है। इसी समय सूर्य को अर्घ्य देना और पूजा करना श्रेष्ठ होता है।
Q 4: रथ सप्तमी पर क्या-क्या करना चाहिए?
इस दिन प्रातः स्नान, सूर्य देव को जल अर्पित करना, सूर्य पूजा, दान-पुण्य और संभव हो तो सूर्य नमस्कार करना शुभ माना जाता है।
Q 5: क्या रथ सप्तमी पर उपवास रखना जरूरी है?
उपवास अनिवार्य नहीं है। श्रद्धा अनुसार हल्का उपवास या सात्विक भोजन किया जा सकता है। सूर्य पूजा और अनुशासन अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
निष्कर्ष
रथ सप्तमी 2026 सूर्य देव की उपासना के साथ जीवन में अनुशासन, स्वास्थ्य और सकारात्मक सोच को अपनाने का पर्व है। यह हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की प्रेरणा देता है और यह याद दिलाता है कि सच्ची प्रगति वही है, जो संतुलन के साथ हो।
अस्वीकरण (Disclaimer)
इस लेख में दी गई जानकारी विभिन्न हिंदू पंचांगों, धार्मिक ग्रंथों, लोक-मान्यताओं और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों के आधार पर तैयार की गई है। रथ सप्तमी 2026 से जुड़ी तिथि, पूजा विधि और धार्मिक मान्यताएँ क्षेत्र, परंपरा और पंचांग के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।
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